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September 03 2026 03:49 am

'मोदी सरकार ने गरीबों की लाइफलाइन को बर्बाद कर दिया...': मनरेगा की जगह नई व्यवस्था लाने पर भड़के जयराम रमेश

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देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों गरीब परिवारों की आजीविका के सबसे बड़े साधन 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना' (MGNREGA) की जगह केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि सरकार ने देश के गरीबों की सबसे बड़ी 'लाइफलाइन' को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। जयराम रमेश ने आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि 'विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन गारंटी ग्रामीण' (VB G RAM G) के नाम पर दो दशक पुराने ऐतिहासिक मनरेगा कानून को खत्म कर ग्रामीण मजदूरों से काम का कानूनी अधिकार छीनने की सोची-समझी साजिश रची गई है। कांग्रेस नेता के इस आक्रामक बयान के बाद ग्रामीण रोजगार, बजट आवंटन और न्यूनतम मजदूरी के मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक सियासी घमासान तेज हो गया है।

'VB G RAM G' के नाम पर मनरेगा का विनाश: संसद के दावों को जयराम रमेश ने बताया खोखला

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक विस्तृत रिपोर्ट साझा करते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र सरकार की नीतियों की कड़े शब्दों में आलोचना की। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर भारतीय जनता पार्टी के मंत्रियों और नेताओं ने ग्रामीण विकास और नई योजना को लेकर बड़े-बड़े और लुभावने भाषण दिए थे, लेकिन धरातल पर वे सभी दावे केवल 'खोखली हवा' साबित हो रहे हैं।

जयराम रमेश ने कहा कि जब सरकार ने मनरेगा के कानूनी ढांचे में बदलाव किया था, तभी कांग्रेस पार्टी ने आगाह किया था कि यह कदम देश के सबसे कमजोर और वंचित तबकों के लिए आत्मघाती साबित होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह केवल किसी योजना का नाम बदलने या री-ब्रांडिंग करने का मामला नहीं है, बल्कि देश के सबसे सफल और ऐतिहासिक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को जानबूझकर खत्म करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र है। सरकार ने गरीबों को कानून के तहत मिलने वाले 'काम के अधिकार' को एक कमजोर प्रशासनिक ढांचे में तब्दील कर दिया है।

बलिया के आंकड़ों से खुली पोल: 1.76 लाख मानव-दिवस के लक्ष्य के मुकाबले मिला सिर्फ 10 हजार काम

अपने आरोपों को पुष्ट करने के लिए जयराम रमेश ने उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आधिकारिक विभागीय आंकड़ों को सार्वजनिक किया। उन्होंने बताया कि बलिया जिले में नई व्यवस्था लागू होने के बाद जॉब कार्ड धारक मजदूरों में भारी निराशा और हताशा फैल चुकी है।

आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने खुलासा किया कि बलिया में पिछले दो महीनों के दौरान 1.76 लाख मानव-दिवस (Man-Days) रोजगार सृजित करने का आधिकारिक लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि मजदूरों को महज 10,669 मानव-दिवस का ही काम उपलब्ध कराया जा सका। जयराम रमेश ने दावा किया कि यह स्थिति केवल उत्तर प्रदेश के एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कोने-कोने में हर जिले से इसी तरह की चिंताजनक और निराशाजनक तस्वीरें सामने आ रही हैं। नए नियमों और जटिल डिजिटल प्रक्रियाओं के चलते लाखों जॉब कार्ड धारक काम पाने के लिए भटक रहे हैं और उन्हें काम न मिलने पर कोई बेरोजगारी भत्ता भी नहीं मिल पा रहा है।

1 जुलाई से लागू हुआ नया कानून: 'रोजगार की कानूनी गारंटी छीनने की सोची-समझी साजिश'

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने करीब दो दशक पुराने मनरेगा अधिनियम को संशोधित करते हुए 1 जुलाई से पूरे देश में 'विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन गारंटी (ग्रामीण)' यानी 'VB G RAM G एक्ट' को प्रभावी किया है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार द्वारा साल 2005 में लागू किए गए मनरेगा कानून के तहत हर ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम की कानूनी गारंटी दी गई थी। इसमें काम मांगने के 15 दिनों के भीतर काम न मिलने पर मुआवजे का स्पष्ट वैधानिक प्रावधान था।

कांग्रेस का आरोप है कि नए कानून ने मनरेगा की इस मूल वैधानिक बाध्यता (Demand-Driven Nature) को कमजोर कर दिया है। नई व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच फंड शेयरिंग, बजट की ऊपरी सीमा और डिजिटल उपस्थिति के ऐसे कड़े मापदंड तय कर दिए गए हैं, जिससे जरूरतमंद मजदूरों को आसानी से मस्टरोल में शामिल नहीं किया जा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि कोरोना महामारी जैसे संकट के समय जिस मनरेगा ने करोड़ों प्रवासियों और गरीबों को भुखमरी से बचाया था, उसे कमजोर करना ग्रामीण भारत की रीढ़ पर प्रहार करने जैसा है।

अनूप सतपथी समिति की सिफारिशों के आधार पर न्यूनतम मजदूरी की मांग

जयराम रमेश और कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार से मांग की है कि इस नए ग्रामीण रोजगार कानून को तत्काल प्रभाव से निरस्त (Repeal) किया जाए और पुराने, मजबूत मनरेगा को दोबारा बहाल किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने मजदूरों को मिलने वाली दैनिक मजदूरी की दरों में आमूलचूल संशोधन की मांग उठाई है।

कांग्रेस का कहना है कि वर्तमान में ग्रामीण मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी बाजार की वास्तविक महंगाई दरों के मुकाबले बेहद कम और अन्यायपूर्ण है। पार्टी ने मांग रखी है कि डॉ. अनूप सतपथी की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति द्वारा साल 2019 में अनुशंसित राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी को आधार बनाया जाए और उसके बाद से अब तक बढ़ी खुदरा महंगाई को जोड़कर दैनिक मजदूरी को कम से कम ₹400 प्रति दिन तय किया जाना चाहिए। जयराम रमेश का तर्क है कि जब तक अकुशल मजदूरों को सम्मानजनक मजदूरी नहीं मिलेगी, तब तक ग्रामीण उपभोग और अर्थव्यवस्था में मांग का पुनरुद्धार नहीं हो सकता।

कमरतोड़ महंगाई में गरीबों से निवाला छीनने का आरोप: क्रोनी कैपिटलिज्म पर तीखा हमला

कांग्रेस महासचिव ने अपने बयान में देश में जारी आर्थिक विषमता और महंगाई के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि आज देश का आम नागरिक दूध, दाल, रसोई गैस, खाद्य तेल और सब्जियों की आसमान छूती कीमतों से त्रस्त है। ऐसे कमरतोड़ महंगाई के दौर में जब गरीबों को सबसे ज्यादा सामाजिक सुरक्षा और आय के सहारे की दरकार थी, तब सरकार ने उनसे उनकी आजीविका का आखिरी जरिया भी छीन लिया।

जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि गरीबों के मुंह से आखिरी निवाला छीनकर अपने पसंदीदा बड़े उद्योगपतियों और 'क्रोनी कैपिटलिस्ट्स' के खजाने भरना ही इस सरकार की वास्तविक आर्थिक नीति बन चुकी है। उन्होंने कहा कि सरकार कॉरपोरेट टैक्स में छूट और बड़े कर्जों को बट्टे खाते में डालने में तत्परता दिखाती है, लेकिन जब देश के सबसे गरीब और सीमांत मजदूरों के कल्याण के लिए बजट जारी करने की बात आती है, तो खजाना खाली होने का रोना रोया जाता है।

ग्रामीण संकट और भविष्य की रणनीति: देशव्यापी आंदोलन की तैयारी में कांग्रेस

जयराम रमेश के इस तीखे बयान के बाद यह तय माना जा रहा है कि कांग्रेस और विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन इस मुद्दे को संसद के आगामी सत्रों और आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में एक बड़ा जन-आंदोलन बनाने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस की प्रदेश इकाइयां ग्रामीण स्तर पर 'जॉब कार्ड बचाओ अभियान' और चौपाल चर्चाओं के जरिए मजदूरों को एकजुट करने की रूपरेखा तैयार कर रही हैं।

विपक्ष का कहना है कि जब तक सरकार ग्रामीण मजदूरों को उनके अधिकार, सम्मानजनक मजदूरी और काम की कानूनी गारंटी वापस नहीं देती, तब तक इस नीतिगत बदलाव के खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष जारी रहेगा। मनरेगा पर छिड़ा यह नया विवाद एक बार फिर देश की आर्थिक प्राथमिकताओं, ग्रामीण विकास और गरीबों के संवैधानिक अधिकारों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ले आया है।