बंगाल में ढह गया ममता बनर्जी का अभेद्य किला',आखिर क्या है वो 'Double-M' फैक्टर
India News Live, Digital Desk: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दशक से अधिक समय तक एकछत्र राज करने वाली 'दीदी' यानी ममता बनर्जी के पैरों तले जमीन खिसक गई है। 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी की इस ऐतिहासिक हार के पीछे सबसे बड़ा कारण 'Double-M' (डबल-एम) फैक्टर रहा है। जिस दांव के दम पर ममता अब तक चुनाव जीतती आ रही थीं, उसी ने इस बार उन्हें चुनावी दंगल में चित कर दिया।
क्या है 'Double-M' फैक्टर जिसने बिगाड़ा TMC का खेल?
बंगाल की राजनीति में 'Double-M' का अर्थ है महिला (Mahila) और मुस्लिम (Muslim) वोट बैंक। अब तक ये दोनों वर्ग ममता बनर्जी के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते थे। 'लखी भंडार' जैसी योजनाओं के दम पर दीदी ने महिलाओं के दिल में जगह बनाई थी, वहीं अल्पसंख्यक समुदाय का उन्हें एकतरफा समर्थन मिलता था। लेकिन इस चुनाव में बीजेपी ने न केवल महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर टीएमसी को घेरा, बल्कि अल्पसंख्यक वोटों में भी बड़ी सेंधमारी हुई, जिससे ममता का 'विजय रथ' थम गया।
महिलाओं का मोहभंग और सुरक्षा का सवाल
संदीप रेड्डी और संदेशखाली जैसी घटनाओं ने बंगाल की महिला मतदाताओं के बीच एक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी थी। बीजेपी ने 'नारी शक्ति' और महिलाओं के सम्मान को चुनावी मुद्दा बनाकर ममता के महिला वोट बैंक में बड़ी दरार डाल दी। सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने के बावजूद, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोपों ने महिलाओं को टीएमसी से दूर कर दिया। नतीजों से साफ है कि इस बार 'साइलेंट वोटर' मानी जाने वाली महिलाओं ने बदलाव के पक्ष में बटन दबाया है।
अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव बना दीदी की कमजोरी
ममता बनर्जी का दूसरा सबसे बड़ा हथियार मुस्लिम वोट बैंक था। लेकिन इस बार बंगाल के कुछ हिस्सों में आईएसएफ (ISF) और अन्य छोटे दलों की सक्रियता के कारण अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा हो गया। इसके अलावा, बीजेपी ने इस बार अपनी रणनीति बदलते हुए कुछ क्षेत्रों में बेहद आक्रामक प्रचार किया, जिससे मतों का ध्रुवीकरण हुआ। जब मुस्लिम वोट दो या तीन हिस्सों में बंटे, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला और टीएमसी के कई सुरक्षित माने जाने वाले गढ़ ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
भ्रष्टाचार और सत्ता विरोधी लहर का डबल डोज
'डबल-एम' फैक्टर के साथ-साथ राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार और बेरोजगारी ने भी आग में घी का काम किया। शिक्षक भर्ती घोटाला और राशन घोटाले जैसे मामलों ने युवाओं और आम जनता में नाराजगी पैदा कर दी थी। ममता बनर्जी ने आखिरी वक्त तक अपनी रैलियों के जरिए जनता को साधने की कोशिश की, लेकिन 'परिवर्तन' की जो लहर भाजपा ने पैदा की थी, उसने टीएमसी के सभी दांव फेल कर दिए। बंगाल की जनता ने इस बार स्पष्ट कर दिया कि वह केवल योजनाओं के भरोसे नहीं, बल्कि सुशासन और सुरक्षा के नाम पर वोट देगी।