बप्पा की पूजा में जरूर करें ये दो पावन आरतियां, 'जय गणेश जय गणेश देवा' और 'जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति'
सनातन परंपरा में किसी भी देव-उपासना, हवन, यज्ञ या व्रत की पूर्णता आरती के बिना अधूरी मानी जाती है। गणेश चतुर्थी के महापर्व पर विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की स्थापना और षोडशोपचार पूजन के पश्चात कपूर अथवा शुद्ध घी के दीपक से सपरिवार आरती उतारने का विशेष महात्म्य है। शास्त्रों के अनुसार, आरती करने से पूजा में जाने-अनजाने रह गई त्रुटियां समाप्त हो जाती हैं और साधक को संपूर्ण अनुष्ठान का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।
गणेशोत्सव के दौरान उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक मुख्य रूप से दो आरतियां सर्वाधिक गाई और सुनी जाती हैं—पहली पारंपरिक हिंदी आरती 'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा' और दूसरी समर्थ रामदास स्वामी द्वारा रचित प्रसिद्ध आरती 'जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति'।
1. श्री गणेश जी की लोकप्रिय आरती: 'जय गणेश जय गणेश देवा'
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ (ध्रुवपद)
एकदन्त, दयावन्त, चारभुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥
पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अन्धन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
दीनन की लाज राखो, शम्भु-सुत वारी।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
2. श्री सुखकर्ता दुखहर्ता: 'जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति'
सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥ १ ॥
जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जयदेव जयदेव (ध्रुवपद)
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुमकुमकेशरा।
हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥ २ ॥
जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जयदेव जयदेव
लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥ ३ ॥
जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जयदेव जयदेव
आरती के नियम और महत्व
भगवान गणेश की आरती करते समय कांस्य या पीतल की थाली में स्वास्तिक बनाकर कुमकुम और अक्षत लगाएं। बीच में गाय के शुद्ध घी का पंचमुखी दीपक अथवा भीमसेनी कपूर प्रज्वलित करें। आरती को भगवान के चरणों से आरंभ कर चार बार चरणों में, दो बार नाभि मंडल पर, एक बार मुखारविंद पर और सात बार पूरे श्रीविग्रह के चारों ओर घड़ी की सुई की दिशा (प्रदक्षिणा क्रम) में घुमाना चाहिए। आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हथेलियों से आरती की लौ का स्पर्श लेकर मस्तक और नेत्रों से लगाएं। अंत में उपस्थित सभी भक्तों में मोदक और फल का प्रसाद वितरित करें।