करूर भगदड़ मामला: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले पर लगाई रोक, विजय सरकार को मिली बड़ी राहत
तमिलनाडु की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से एक बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने करूर भगदड़ त्रासदी में अपनी जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द करने वाले मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। इस अंतरिम आदेश से मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार को बहुत बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य के मुख्य सचिव और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस भी जारी किया है।
"सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले आप कौन होते हैं?" - सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने त्रासदी से प्रभावित परिवारों को रोजगार प्रदान करने वाली सरकारी नीति को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने साफ शब्दों में सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की नीति पर सवाल खड़े करने वाले आप आखिर कौन होते हैं? पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मान लीजिए यदि इस भीषण त्रासदी में किसी परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य की मृत्यु हो गई हो, तो क्या सरकार को उनके बेटे या बेटी को नौकरी या आजीविका का सहारा नहीं देना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि अदालत मानवीय दृष्टिकोण को सर्वोपरि मानती है।
क्या था करूर भगदड़ का पूरा मामला?
गौरतलब है कि पिछले साल 27 सितंबर को तमिलनाडु के करूर जिले के वेलुसामीपुरम में टीवीके प्रमुख विजय की एक प्रचार सभा के दौरान भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी, जिसके परिणामस्वरूप अनियंत्रित भीड़ में भगदड़ मच गई थी। इस दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में 41 लोगों की अकाल मृत्यु हो गई थी। इस दिल दहला देने वाली दुर्घटना के बाद राज्य की तमिलनाडु सरकार ने मानवीय आधार पर बड़ा कदम उठाते हुए प्रत्येक मृतक के परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का आधिकारिक निर्णय लिया था और इसके लिए नियुक्ति आदेश भी जारी किए गए थे।
मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी सरकार
राज्य सरकार के इस कल्याणकारी कदम को 'नाम तमिलर काची' के थीरन थिरुमुरुगन और अधिवक्ता सीनी अहमद ने मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस कार्तिकेयन और जस्टिस शक्तिवेल की खंडपीठ ने सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसके तहत परिवारों को नौकरियां दी जा रही थीं। हाई कोर्ट के इस झटके के बाद तमिलनाडु सरकार ने बिना देर किए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ अब शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाकर पीड़ित परिवारों को बड़ी कानूनी राहत प्रदान की है।