कान्हा जी की छठी आज: जानें कढ़ी-चावल के भोग का रहस्य, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की धूम के बाद आज पूरे देश में बाल गोपाल की 'छठी' का पावन पर्व अत्यंत उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा और ब्रज संस्कृति में शिशु के जन्म के ठीक छठे दिन छठी पूजने और नामकरण संस्कार की जो परंपरा सदियों से चली आ रही है, उसी वात्सल्य भाव से भक्त अपने घर के लड्डू गोपाल की सेवा और आराधना करते हैं। आज के दिन सुबह से ही मंदिरों और घरों में उत्सव का माहौल है। बाल स्वरूप ठाकुर जी का पंचामृत अभिषेक, नूतन पीतांबर धारण, काजल की रस्म और कढ़ी-चावल का विशेष भोग लगाकर परिवार की सुख-शांति व समृद्धि की कामना की जा रही है। यदि आपके घर में भी लड्डू गोपाल विराजमान हैं, तो आज की इस विशेष पूजा विधि, भोग के पीछे के धार्मिक महत्व और नियमों को जानकर आप भी कान्हा जी की असीम कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
आज कब करें कान्हा जी की छठी का मुख्य पूजन?
धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, कान्हा जी की छठी का नित्य स्नान और सामान्य शृंगार प्रातः काल किया जाता है, लेकिन मुख्य पूजा का सर्वोत्तम समय शाम को 4 बजे के बाद प्रदोष काल और गोधूलि बेला में माना जाता है। सूर्यास्त के आसपास का समय भगवान कृष्ण के गोचारण से लौटकर घर आने का प्रतीक होता है, इसलिए इस कालखंड में की गई पूजा, सोहर गायन, आरती और महाभोग अत्यंत फलदायी और मंगलकारी सिद्ध होता है।
क्यों लगाया जाता है कढ़ी-चावल का पारंपरिक भोग?
कान्हा जी की छठी की थाली में कढ़ी और चावल का होना सबसे अनिवार्य और मुख्य नियम माना गया है। भारतीय लोक संस्कृति में शिशु के जन्म के छठे दिन प्रसूता और परिवार के लिए सात्विक व सुपाच्य भोजन के रूप में कढ़ी-चावल बनाने की परंपरा रही है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी बेसन और हल्दी से तैयार होने वाली कढ़ी का रंग पीला होता है, और पीला रंग भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण को सर्वाधिक प्रिय है। बेसन को देवगुरु बृहस्पति का और दही को चंद्रमा का कारक माना जाता है। जब इन दोनों का मिश्रण कर बिना लहसुन-प्याज की शुद्ध सात्विक कढ़ी बनाई जाती है, तो यह कुंडली में गुरु और चंद्र के शुभ प्रभाव को जाग्रत करती है। मान्यता है कि आज के दिन लड्डू गोपाल को कढ़ी-चावल का भोग लगाने से घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती और संतान पक्ष को आरोग्य व दीर्घायु का वरदान मिलता है।
माखन-मिश्री और छप्पन भोग की मिठास
कढ़ी-चावल के साथ-साथ कान्हा जी के सबसे प्रिय भोग माखन-मिश्री को थाली में सजाना न भूलें। गाय के शुद्ध दूध की मलाई से ताजा निकाला गया मक्खन और धागे वाली मिश्री का नैवेद्य अर्पित करने से ठाकुर जी तुरंत प्रसन्न होते हैं। इसके साथ ही मखाने की खीर, शुद्ध घी में तले मालपुए, बेसन के लड्डू और पंचामृत का भोग भी लगाया जाता है। ध्यान रखें कि लड्डू गोपाल के प्रत्येक भोग में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) अवश्य रखा जाना चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि बिना तुलसी दल के भगवान श्रीकृष्ण किसी भी नैवेद्य को स्वीकार नहीं करते।
पंचामृत अभिषेक और मनमोहक बाल शृंगार
छठी पूजन के आरंभ में सबसे पहले लड्डू गोपाल को एक कांसे, तांबे या चांदी के शुद्ध पात्र में स्थापित करें। इसके बाद गाय के कच्चे दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद और गंगाजल से बने पंचामृत से उनका दिव्य अभिषेक करें। शंख में गंगाजल भरकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का उच्चारण करते हुए अंतिम स्नान कराएं। इसके बाद मुलायम सूती वस्त्र से पोंछकर उन्हें नवीन पीले रंग की पोशाक (पीतांबर) पहनाएं। उनके शीश पर मोरपंख लगा मुकुट, हाथों में छोटी बांसुरी, कमर में करधनी और पैरों में घुंघरूदार पायल पहनाकर चंदन व सुगंधित इत्र से अलौकिक शृंगार करें।
काजल की रस्म और नजर उतारने का विधान
शिशु परंपरा के अनुसार, माता यशोदा के वात्सल्य भाव को चरितार्थ करते हुए आज के दिन बाल गोपाल की आंखों में घर का बना शुद्ध काजल आंका जाता है। किसी भी प्रकार के नजर दोष और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा के लिए कान्हा जी के कान के पीछे या गाल पर एक छोटा सा काला टीका लगाया जाता है। इसके उपरांत घर की माताएं और बहनें एक थाली में राई, नमक या न्यौछावर के सिक्के रखकर लड्डू गोपाल के सिर से सात बार वारकर नजर उतारती हैं। यह रस्म ईश्वर और भक्त के बीच के निश्चल और निस्वार्थ प्रेम का सुंदर उदाहरण है।
नामकरण संस्कार और तिजोरी की चाबी सौंपने की परंपरा
यदि आपने इस जन्माष्टमी पर ही लड्डू गोपाल को अपने घर में स्थापित किया है, तो आज छठी के दिन उनका नामकरण करने की मुख्य प्रथा है। आप उन्हें लड्डू, गोपाल, कान्हा, माधव, बांके या अपनी पसंद का कोई भी प्रिय नाम देकर उसी नाम से पुकारने का संकल्प ले सकते हैं। पूजन और महाआरती संपन्न होने के बाद घर की तिजोरी, अलमारी या व्यापारिक प्रतिष्ठान की मुख्य चाबी को एक बार लड्डू गोपाल के श्रीचरणों में अवश्य स्पर्श कराएं। ऐसा माना जाता है कि जो साधक अपने घर की चाबी और आर्थिक बागडोर ठाकुर जी के चरणों में सौंप देता है, उसके घर में वर्षभर सुख, शांति और मां लक्ष्मी का अखंड वास बना रहता है।
सोहर मंगलगीत और दीपदान से करें पूजा का समापन
पूजा की पूर्णता के लिए परिवार के सभी सदस्य एकत्र होकर ढोलक-मंजीरे की धुन पर कृष्ण जन्म के पारंपरिक सोहर और बधाई गीत गाएं। इसके बाद शुद्ध गाय के घी का चौमुखी दीपक प्रज्वलित कर कान्हा जी की आरती उतारें। अंत में कढ़ी-चावल और माखन-मिश्री का प्रसाद घर के सभी सदस्यों में बांटें और पड़ोसियों व जरूरतमंदों को भी आदरपूर्वक खिलाएं। यह पावन पर्व घर के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और खुशियों का नया संचार करता है।