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November 05 2026 10:30 pm

'संसद तय करेगी, अदालतें नहीं': मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग पर केंद्र सरकार का दो टूक जवाब

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वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप (Marital Rape) को आपराधिक कृत्य घोषित करने और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद-2 (अब भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 63 के अपवाद-2) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने देश की शीर्ष अदालत में एक बार फिर कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी कृत्य को नया अपराध घोषित करना या कानूनों में नीतिगत बदलाव करना पूरी तरह संसद (विधायिका) के अधिकार क्षेत्र में आता है, अदालत के नहीं। केंद्र ने दलील दी कि यह केवल एक तकनीकी या कानूनी सवाल नहीं है, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल सामाजिक मुद्दा है, जिसे न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के जरिए सीधे तय नहीं किया जा सकता।

'अदालती फैसले से अपराध घोषित करना गलत': केंद्र सरकार के मुख्य तर्क

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र ने अपने हलफनामे और दलीलों में कई प्रमुख बिंदु रखे:

विधायिका की संप्रभुता: सरकार का कहना है कि किसी देश में कौन सा कृत्य 'अपराध' माना जाएगा और उसकी क्या सजा होगी, यह तय करने का संवैधानिक जनादेश केवल जनता द्वारा चुनी गई संसद के पास है। अदालतें यदि धारा 375 या BNS की धारा 63 के अपवाद को रद्द करती हैं, तो यह न्यायिक सक्रियता के जरिए नए अपराध का सृजन करने जैसा होगा।

विवाह संस्था पर गंभीर असर: केंद्र ने पूर्व में दाखिल विस्तृत हलफनामे का हवाला देते हुए दोहराया कि वैवाहिक संबंधों को अजनबियों के बीच होने वाले यौन अपराधों के समान तराजू में नहीं तौला जा सकता। पति-पत्नी के रिश्ते में वैवाहिक अधिकार और परस्पर अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं। यदि इसे सीधे तौर पर 'बलात्कार' की कठोर धाराओं के तहत लाया गया, तो यह विवाह की पवित्र संस्था को अस्थिर कर सकता है और पारिवारिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकता है।

दुरुपयोग और सहमति साबित करने की जटिलता: सरकार ने चिंता जताई कि चारदीवारी के भीतर पति-पत्नी के बीच सहमति (Consent) थी या नहीं, इसे कानूनी और फॉरेंसिक रूप से साबित करना बेहद कठिन होगा। इसके चलते इस प्रावधान का दुरुपयोग निजी रंजिश निकालने या पतियों को प्रताड़ित करने के हथियार के रूप में होने का गंभीर जोखिम रहेगा।

पहले से मौजूद हैं सुरक्षा कानून: घरेलू हिंसा और क्रूरता का विकल्प

केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि कानून विवाहित महिलाओं के अधिकारों और गरिमा की अनदेखी करता है। सरकार के अनुसार:

विवाहित महिला के साथ किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या जबरन यौन हिंसा होने पर उसके पास घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (DV Act, 2005) के तहत मजबूत कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं।

इसके अतिरिक्त, कानून की धारा 498A (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान पहले से देश के कानून में मौजूद है।

ऐसे में सीधे 'बलात्कार' की धाराएं लगाना अत्यधिक कठोर और असंगत (Disproportionate) कदम साबित होगा।

दिल्ली हाईकोर्ट के विभाजित फैसले से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

मैरिटल रेप का कानूनी विवाद पिछले कई वर्षों से अदालतों में लंबित है:

दिल्ली हाईकोर्ट का स्प्लिट वर्डिक्ट: मई 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट की दो जजों की बेंच ने इस पर विभाजित फैसला सुनाया था। जस्टिस राजीव शकधर ने इस अपवाद को असंवैधानिक मानते हुए रद्द करने का फैसला दिया था, जबकि जस्टिस सी. हरि शंकर ने अपवाद को सही ठहराते हुए कहा था कि यह बदलाव सिर्फ संसद ही कर सकती है।

नए कानूनों (BNS) में भी बरकरार रखा गया अपवाद: संसद द्वारा 1 जुलाई 2024 से लागू किए गए भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भी धारा 63 के अपवाद-2 के तहत इस व्यवस्था को बनाए रखा गया है, जिसमें 18 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ संबंध को बलात्कार के दायरे से बाहर रखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले के सभी पक्षों और केंद्र सरकार के रुख को ध्यान में रखते हुए विस्तृत और निर्णायक संवैधानिक सुनवाई की तारीख तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह देखना अहम होगा कि शीर्ष अदालत विधायिका के अधिकार क्षेत्र के सम्मान और महिलाओं के शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन कैसे साधती है।