अखिलेश यादव और उनकी बेटी पर अभद्र टिप्पणी मामला, प्रयागराज कोर्ट सख्त, पुलिस से तलब की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तथा उनके परिवार के खिलाफ सोशल मीडिया पर की जा रही अमर्यादित टिप्पणियों के मामले में अदालत ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। प्रयागराज की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) अदालत ने इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए पुलिस प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है। सीजेएम कोर्ट का यह आदेश अधिवक्ता विनीत विक्रम की दलीलें सुनने के बाद आया है। कोर्ट अब इस हाई-प्रोफाइल मामले में आगामी 18 जून 2026 को अगली सुनवाई करेगी, जिसमें दोषियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने और साइबर सेल द्वारा विवेचना शुरू करने के संबंध में अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।
कोर्ट में लगाई गई गुहार: सुनियोजित दुष्प्रचार का आरोप
यह पूरा मामला तब अदालत पहुंचा जब समाजवादी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष योगेश चन्द्र यादव ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173(4) के तहत सीजेएम न्यायालय में एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया। इस अर्जी में मांग की गई थी कि संबंधित पुलिस स्टेशन या विशेष साइबर क्राइम यूनिट को तुरंत केस दर्ज कर जांच के आदेश दिए जाएं।
अर्जी में कहा गया है कि 9 जून 2026 को जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का विश्लेषण किया गया, तो पाया गया कि कई संदिग्ध और फर्जी अकाउंट्स द्वारा अखिलेश यादव, उनके परिवार और विशेष रूप से उनकी बेटी के खिलाफ पूरी तरह तथ्यहीन, अश्लील और मानहानिकारक कंटेंट फैलाया जा रहा है। इसका एकमात्र उद्देश्य उनकी सामाजिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा को गंभीर ठेस पहुंचाना है।
"राजनीति से परे है बेटी का सम्मान": एआई (AI) तस्वीरों का इस्तेमाल
प्रार्थना पत्र में विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया गया है कि अखिलेश यादव की पुत्री एक साधारण छात्रा हैं, जिनका किसी भी राजनीतिक विमर्श या सार्वजनिक नीति से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही हैं, जो सीधे तौर पर एक महिला की निजता और गरिमा का उल्लंघन है।
अदालत को यह भी बताया गया कि कई फर्जी सोशल मीडिया हैंडल्स द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार की गई भ्रामक तस्वीरें और डिजिटल सामग्री शेयर की जा रही है, जो इस बात का साफ संकेत है कि यह किसी एक व्यक्ति की सामान्य हरकत नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और समन्वित (Coordinated IP Campaign) दुष्प्रचार का हिस्सा है।
साक्ष्य मिटाने का डर, आईटी एक्ट की इन धाराओं में केस की मांग
अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने अकाट्य डिजिटल साक्ष्य, स्क्रीनशॉट और सोशल मीडिया यूआरएल (URLs) पेश करते हुए कहा कि चूंकि यह पूरा मामला पूरी तरह डिजिटल और साइबर डोमेन से जुड़ा है, इसलिए दोषियों के आईपी एड्रेस (IP Address), लॉगिन हिस्ट्री, लिंक्ड मोबाइल नंबर और ई-मेल आईडी का पता केवल पुलिस की साइबर एक्सपर्ट एजेंसियां ही लगा सकती हैं। कोर्ट को आगाह किया गया कि यदि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई नहीं की, तो आरोपी डिजिटल रिकॉर्ड डिलीट करके महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नष्ट कर सकते हैं।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 79, 294, 352, 353(2), 356 के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की धारा 66-ई, 67 और 67-ए के तहत गंभीर साइबर अपराध का मामला दर्ज करने की मांग की गई है। अब सभी की निगाहें 18 जून को होने वाली कोर्ट की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।