कैसे बढ़ाई जाती है 5G मोबाइल टावर की क्षमता? जानिए मैसिव माइमो से लेकर स्मॉल सेल्स तक का पूरा तकनीकी

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देशभर में 5G रोलआउट के विस्तार के साथ ही स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या और दैनिक डेटा खपत में ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया गया है। 4K वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड गेमिंग, वर्क फ्रॉम होम और एआई टूल्स के भारी इस्तेमाल के चलते अक्सर भीड़भाड़ वाले इलाकों, रेलवे स्टेशनों, मॉल या बड़े आयोजनों में 5G स्पीड अचानक धीमी होने लगती है या नेटवर्क कंजेशन की समस्या सामने आती है। जब किसी इलाके में एक ही समय पर हजारों 5G डिवाइसेज सक्रिय हो जाते हैं, तो बेस स्टेशन की मौजूदा डेटा वहन क्षमता (Throughput) अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है।

इस डिजिटल जाम से निपटने के लिए रिलायंस जियो और भारती एयरटेल जैसी प्रमुख टेलीकॉम कंपनियां अपने नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर को लगातार अपग्रेड करती हैं। लेकिन किसी मोबाइल टावर की क्षमता बढ़ाना केवल एक सॉफ्टवेयर स्विच ऑन करने जितना आसान नहीं है। इसमें एंटीना टेक्नोलॉजी, रेडियो फ्रीक्वेंसी मैनेजमेंट, ऑप्टिकल फाइबर बैकहॉल और बेस स्टेशन के भारी हार्डवेयर अपग्रेड शामिल होते हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि 5G टावर की कैपेसिटी कैसे बढ़ाई जाती है और इस पूरी प्रक्रिया में टेलीकॉम कंपनियों का कितना पैसा खर्च होता है।

5G टावर की क्षमता बढ़ाने के 6 मुख्य तकनीकी तरीके: जानिए कैसे बढ़ता है डेटा का फ्लो

टेलीकॉम कंपनियां रेडियो फिजिक्स और आधुनिक नेटवर्क आर्किटेक्चर के जरिए टावर की कैपेसिटी को कई गुना बढ़ाती हैं:

मैसिव माइमो (Massive MIMO - 32T32R से 64T64R अपग्रेड): पारंपरिक 4G टावरों में आमतौर पर 2 से 4 एंटीना (2T2R या 4T4R) होते थे। 5G में क्षमता बढ़ाने के लिए टावर पर 'मैसिव माइमो' (Multiple Input Multiple Output) पैनल लगाए जाते हैं, जिनमें 32 से लेकर 64 ट्रांसमीटर और 64 रिसीवर एंटीना का पूरा जाल (Array) होता है। यह एक साथ दर्जनों यूजर्स को अलग-अलग डेटा स्ट्रीम भेज सकता है, जिससे टावर की कुल डेटा क्षमता 5 से 10 गुना तक बढ़ जाती है।

3D बीमफॉर्मिंग (Beamforming Technology): पुराने टावर सभी दिशाओं में एक समान सिग्नल फेंकते थे, जिससे ऊर्जा और बैंडविड्थ बर्बाद होती थी। 5G टावर बीमफॉर्मिंग तकनीक का उपयोग करके लेजर लाइट की तरह सिग्नल की एक सीधी और संकीर्ण किरण (Beam) सीधे यूजर के स्मार्टफोन की तरफ केंद्रित करता है। इससे सिग्नल में रुकावट (Interference) कम होती है और डेटा स्पीड कई गुना बढ़ जाती है।

कैरियर एग्रीगेशन (Carrier Aggregation - CA): यह अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड्स को आपस में जोड़ने की तकनीक है। जैसे 700 MHz (जो दीवारों के आर-पार लंबी दूरी तक जाता है) और 3.5 GHz (जो भारी डेटा स्पीड देता है) को एक साथ क्लब कर दिया जाता है। इससे फोन को एक साथ कई लेन्स (सड़कों) से डेटा मिलता है, जिससे भीड़ में भी सुपरफास्ट स्पीड बनी रहती है।

टावर का फाइबराइजेशन (10G/25G Fiber Backhaul): हवा से मोबाइल तक डेटा पहुंचाना तभी संभव है जब टावर के पीछे तेज इंटरनेट पाइपलाइन हो। पुराने टावर जो माइक्रोवेव डिश एंटीना पर निर्भर थे, उनकी क्षमता सीमित थी। कंपनियों द्वारा हर टावर को अंडरग्राउंड हाई-कैपेसिटी ऑप्टिकल फाइबर केबल से जोड़ा जाता है। 1 Gbps से 10 Gbps और 25 Gbps की ऑप्टिकल लाइन्स लगने से टावर का बैकहॉल जाम नहीं होता।

स्मॉल सेल्स और नेटवर्क डेंसिफिकेशन (Small Cells): बड़े मैक्रो टावर की क्षमता सीमित होने पर टेलीकॉम कंपनियां घने बाजारों और सोसायटियों में बिजली के खंभों, स्ट्रीट लाइट और इमारतों की दीवारों पर 'स्मॉल सेल्स' (माइक्रो बेस स्टेशन) लगाती हैं। ये छोटे उपकरण मुख्य टावर से 30-40% ट्रैफिक का भार खुद पर ले लेते हैं।

बेस स्टेशन कंप्यूटिंग व vRAN अपग्रेड: टावर के नीचे लगे बेस ट्रांससीवर स्टेशन (BTS) और बेसिस बैंड यूनिट्स (BBU/DU) के प्रोसेसर को अपग्रेड किया जाता है ताकि वह प्रति सेकंड लाखों डेटा पैकेट्स को बिना किसी लेटेंसी (Lag) के प्रोसेस कर सके।

5G टावर लगाने और क्षमता अपग्रेड करने में कितना खर्च होता है? समझिए पूरा वित्तीय गणित

टेलीकॉम सेक्टर में टावर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला खर्च दो श्रेणियों में बंटा होता है—मौजूदा साइट को 5G कैपेसिटी में अपग्रेड करना और एक बिल्कुल नया 5G मैक्रो टावर स्थापित करना।

मौजूदा 4G/5G टावर की क्षमता अपग्रेड करने का खर्च: यदि टावर का ढांचा (Pole/Mast) और बिजली का कनेक्शन पहले से मौजूद है, तो केवल 64T64R मैसिव माइमो एंटीना, नए रेडियो रिमोट हेड्स (RRH), बेसबैंड कार्ड्स और फाइबर राउटर लगाने में लगभग ₹10 लाख से ₹25 लाख प्रति साइट का खर्च आता है।

एक बिल्कुल नया 5G मैक्रो टावर लगाने का खर्च: जमीन लीज पर लेने, कंक्रीट फाउंडेशन बनाने, 30 से 40 मीटर ऊंचा लोहे का टावर खड़ा करने, डीजी सेट (जनरेटर), लिथियम-आयन बैटरी बैंक, एयर कंडीशनिंग शेल्टर, फाइबर कनेक्टिविटी और संपूर्ण 5G रेडियो इक्विपमेंट लगाने की कुल लागत लगभग ₹35 लाख से ₹60 लाख (कुछ जटिल लोकेशंस पर ₹80 लाख तक) बैठती है।

स्मॉल सेल (Small Cell) लगाने का खर्च: बिजली के खंभे या स्ट्रीट पोल पर एक सिंगल 5G स्मॉल सेल नोड लगाने का खर्च लगभग ₹1.5 लाख से ₹4 लाख प्रति यूनिट आता है। एक शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके को कवर करने के लिए ऐसे दर्जनों स्मॉल सेल्स की आवश्यकता होती है।

ऑप्टिकल फाइबर बिछाने की लागत: टावर तक जमीन के नीचे ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC) पहुंचाने का खर्च काफी अधिक होता है। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन को दिए जाने वाले राइट ऑफ वे (RoW) चार्ज और खुदाई व केबलिंग मिलाकर यह खर्च औसतन ₹8 लाख से ₹15 लाख प्रति किलोमीटर तक होता है।

5G टावर अपग्रेड के प्रमुख घटकों का अनुमानित लागत ब्रेकडाउन

नीचे दी गई तालिका से समझें कि किसी 5G साइट की क्षमता बढ़ाने के दौरान विभिन्न हार्डवेयर और इन्फ्रास्ट्रक्चर घटकों पर कितना पूंजीगत व्यय (Capex) होता है:

उपकरण / इन्फ्रास्ट्रक्चर घटकतकनीकी कार्यअनुमानित खर्च (INR)
64T64R Massive MIMO एंटीना यूनिट्समल्टीपल यूजर डेटा ट्रांसमिशन और बीमफॉर्मिंग₹6 लाख – ₹12 लाख
बेसबैंड यूनिट (BBU / DU / CU) व प्रोसेसर्सडिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग और पैकेट राउटिंग₹3 लाख – ₹6 लाख
पावर सिस्टम व लिथियम बैटरी बैकअप5G के अतिरिक्त पावर लोड के लिए 24x7 बिजली बैकअप₹2 लाख – ₹4 लाख
10G/25G ऑप्टिकल फाइबर स्विच व राउटर्सहाई-स्पीड बैकहॉल डेटा ट्रांसफर₹1.5 लाख – ₹3 लाख
सिविल रीइन्फोर्समेंट व इंस्टॉलेशन चार्जभारी एंटेना का वजन सहने हेतु टावर की मजबूती₹1 लाख – ₹2.5 लाख

5G टावरों को क्षमता बढ़ाने में किन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

टावर की क्षमता बढ़ाना केवल पैसे लगाने का काम नहीं है, इसके रास्ते में कई व्यावहारिक और भौगोलिक बाधाएं भी आती हैं:

अत्यधिक बिजली की खपत: 5G मैसिव माइमो टावर सामान्य 4G टावर की तुलना में लगभग 2 से 3 गुना अधिक बिजली की खपत करते हैं। इसके लिए टावर साइट पर बड़े बिजली ट्रांसफॉर्मर और विशाल बैटरी बैंकों की आवश्यकता होती है।

टावर के स्ट्रक्चर पर अतिरिक्त भार: 64T64R एंटीना का वजन 35 से 50 किलोग्राम प्रति पैनल तक होता है। एक टावर पर तीनों दिशाओं (Sectors) में ऐसे भारी एंटेना लगाने से पहले टावर की स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी की जांच करनी होती है। कमजोर छतों या पुराने टावरों पर इन्हें लगाना जोखिम भरा होता है।

राइट ऑफ वे (RoW) की मंजूरी: शहरों में अंडरग्राउंड फाइबर बिछाने के लिए नगर निगमों से खुदाई की अनुमति (RoW Clearance) मिलने में महीनों का समय लग जाता है, जिससे फाइबराइजेशन की गति धीमी हो जाती है।

टेलीकॉम कंपनियां निरंतर एआई-आधारित 'सेल्फ-ऑर्गनाइजिंग नेटवर्क्स' (SON) का भी इस्तेमाल कर रही हैं, जो ट्रैफिक का दबाव बढ़ते ही ऑटोमैटिकली नजदीकी टावरों की रेडियो पावर और बीम्स को उस भीड़ की तरफ मोड़ देते हैं। इससे बिना नया हार्डवेयर लगाए भी तात्कालिक रूप से टावर की क्षमता को मैनेज कर लिया जाता है।