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September 18 2026 08:09 pm

फिजी में एचआईवी एड्स ने मचाया हाहाकार, 60 में से एक शख्स संक्रमित; लगा राष्ट्रीय आपातकाल, जानें भारत में कितने मरीज

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प्रशांत महासागर में स्थित खूबसूरत द्वीपीय देश फिजी इस समय एक अभूतपूर्व और भयावह स्वास्थ्य संकट के दौर से गुजर रहा है। देश में एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस) और एड्स के मामलों में अचानक आई सुनामी जैसी तेजी को देखते हुए फिजी सरकार ने पूरे देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल (National Public Health Emergency) लागू कर दिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, फिजी में अब लगभग हर 60 वयस्कों में से एक व्यक्ति एचआईवी पॉजिटिव पाया जा रहा है, जिसने वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों के कान खड़े कर दिए हैं। जहां एक तरफ दुनिया भर में नए एचआईवी संक्रमणों की दर में गिरावट देखी जा रही है, वहीं फिजी में इसका 16 गुना तक तेजी से बढ़ना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का सबसे बड़ा कारण बन गया है। इस गंभीर संकट के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि भारत में एचआईवी की मौजूदा स्थिति क्या है और यहां कितने मरीज हैं।

फिजी में क्यों लागू करना पड़ा राष्ट्रीय आपातकाल?

फिजी के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. एंटोनियो लालाबालावु ने स्वास्थ्य आपातकाल की औपचारिक घोषणा करते हुए स्वीकार किया कि अब केवल सामान्य स्तर के उपायों से इस महामारी पर काबू पाना संभव नहीं रह गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 9 लाख से भी कम आबादी वाले इस देश में एचआईवी संक्रमण की दर ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। पांच साल पहले तक फिजी में हर 167 लोगों में से एक व्यक्ति एचआईवी से पीड़ित था, लेकिन अब यह अनुपात तेजी से घटकर हर 60 में से एक पर आ गया है।

संयुक्त राष्ट्र एजेंसी यूएनएड्स (UNAIDS) की रिपोर्ट के मुताबिक, फिजी में वर्तमान में 9,100 से अधिक लोग एचआईवी के साथ जी रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इनमें से केवल 39 प्रतिशत लोगों को ही अपनी स्थिति की जानकारी है, जबकि मात्र 22 प्रतिशत संक्रमित ही एंटीरेट्रोवाइरल (ART) इलाज प्राप्त कर पा रहे हैं। समय पर पहचान और उपचार के अभाव में वायरस तेजी से एड्स का रूप ले रहा है और मौत का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है।

मेथमफेटामाइन, सिरिंज शेयरिंग और 'ब्लूटूथिंग' बना संक्रमण का मुख्य जरिया

फिजी में एचआईवी के इस विस्फोट के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी का बढ़ता जाल है। फिजी लंबे समय से लैटिन अमेरिका और एशिया से ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में भेजी जाने वाली नशीली दवाओं का एक बड़ा ट्रांजिट हब रहा है। इस दौरान स्थानीय स्तर पर कोकीन और मेथमफेटामाइन (मेथ) जैसे खतरनाक ड्रग्स का उपयोग तेजी से बढ़ा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, 42 से 50 प्रतिशत नए मामले इंजेक्शन के जरिए नशीली दवाएं लेने और एक ही सिरिंज को कई लोगों द्वारा साझा करने की वजह से सामने आए हैं। इसके अलावा 'ब्लूटूथिंग' या 'हॉटस्पॉटिंग' जैसी खतरनाक प्रथा ने भी आग में घी का काम किया है, जिसमें एक नशेड़ी व्यक्ति के खून को सिरिंज में भरकर दूसरा व्यक्ति अपने शरीर में इंजेक्ट करता है। बाकी मामले असुरक्षित यौन संबंध और कंडोम के बेहद कम इस्तेमाल के कारण फैले हैं। चिंता की बात यह भी है कि हर 50 गर्भवती महिलाओं में से एक एचआईवी संक्रमित पाई गई है, जिसके चलते नवजात शिशुओं में भी यह जानलेवा वायरस फैल रहा है। संकट से निपटने के लिए भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और डब्ल्यूएचओ मिलकर फिजी को मुफ्त टेस्टिंग किट और दवाइयां मुहैया करा रहे हैं।

भारत में एचआईवी की क्या है स्थिति और कितने हैं मरीज?

फिजी के इस संकट के सामने आने के बाद भारत के आंकड़ों पर भी नजर डाली जा रही है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 25 से 26 लाख (2.5 to 2.6 Million) लोग एचआईवी के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया के बाद कुल मरीजों की संख्या के लिहाज से भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर आता है।

हालांकि, भारत की विशाल 1.4 अरब की आबादी को देखते हुए यहां एचआईवी की व्यापकता दर (Prevalence Rate) वयस्कों में केवल 0.20 से 0.21 प्रतिशत के आसपास है, जो वैश्विक औसत से काफी कम और नियंत्रित मानी जाती है।

भारत में नए मामलों में 44% से अधिक की गिरावट, मुफ्त इलाज का मजबूत तंत्र

फिजी के विपरीत, भारत ने पिछले डेढ़ दशक में एचआईवी और एड्स के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सबसे सफल और अनुकरणीय अभियानों में से एक चलाया है।

नए मामलों में भारी कमी: साल 2010 की तुलना में भारत में नए एचआईवी संक्रमणों में 44 प्रतिशत से अधिक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। एड्स से होने वाली मौतों के आंकड़ों में भी 75 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।

मुफ्त जांच और काउंसलिंग: देश भर में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) के तहत संचालित एकीकृत परामर्श और परीक्षण केंद्रों (ICTC) के जरिए प्रतिवर्ष 3 करोड़ से अधिक लोगों की मुफ्त जांच की जाती है।

गर्भवती महिलाओं की अनिवार्य स्क्रीनिंग: मां से बच्चे में वायरस के प्रसार को रोकने के लिए भारत में सभी गर्भवती महिलाओं की अनिवार्य जांच कराई जाती है, जिससे नवजात शिशुओं को संक्रमण से बचाने में 90% से अधिक सफलता मिली है।

मुफ्त एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी (ART): भारत सरकार देश भर के सैकड़ों एआरटी केंद्रों के माध्यम से लाखों पंजीकृत एचआईवी मरीजों को आजीवन मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि फिजी की स्थिति यह दिखाती है कि एचआईवी की रोकथाम में किसी भी तरह की लापरवाही या नशीली दवाओं का बढ़ता नेटवर्क किसी भी समाज को रातों-रात भयानक त्रासदी में धकेल सकता है।