बनारस की इन ऐतिहासिक गलियों में है 'गुड्डू भैया' का असली ठिकाना, शूटिंग के दौरान साए की तरह मौजूद रहते थे ये दो खास लोग
भारतीय सिनेमा और ओटीटी की दुनिया में जब भी पूर्वांचल के भौकाल, बदले की आग और खूनी संघर्ष की बात होती है, तो सबसे पहला नाम 'मिर्जापुर' का ही जेहन में उभरता है। बड़े पर्दे पर रिलीज हुई 'मिर्जापुर: द मूवी' (Mirzapur The Movie) ने दर्शकों को एक बार फिर कालीन भैया और गुड्डू पंडित के उसी कच्चे और हिंसक दौर में पहुंचा दिया है। फिल्म के एक्शन, संवाद और लोकेशंस ने दर्शकों को सिनेमाघरों में बांधे रखा। इस फ्रेंचाइजी की सबसे बड़ी ताकत रही है इसकी प्रामाणिक जमीन और रियलिस्टिक लोकेशंस। विशेष रूप से पंडित परिवार यानी 'गुड्डू भैया' (अली फजल) का वह साधारण सा दिखने वाला दोमंजिला मकान, जिसने बदले की पूरी दास्तान को जन्म दिया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पर्दे पर दिखने वाला गुड्डू पंडित का यह घर वास्तव में कहां स्थित है? और जब इस फिल्म की शूटिंग बनारस के इन तंग रास्तों में हो रही थी, तो सेट पर हर वक्त अली फजल के साथ साए की तरह कौन से दो बेहद खास लोग मौजूद रहते थे?
बनारस के पक्के महाल और घाटों के पास स्थित है पंडित जी का असली ठिकाना
स्क्रीन पर भले ही इस घर को मिर्जापुर शहर का हिस्सा दिखाया जाता हो, लेकिन हकीकत में गुड्डू पंडित और वकील रमाकांत पंडित का यह घर उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी (बनारस) की प्राचीन गलियों में स्थित है।
यह लोकेशन बनारस के प्रसिद्ध गंगा घाटों के समीप स्थित पारंपरिक 'पक्के महाल' के पुराने रिहायशी इलाके में आती है। चूने-सुर्खी की मोटी दीवारें, संकरी सीढ़ियां, लोहे की जालीदार खिड़कियां और बीच में बना छोटा सा खुला आंगन—यह घर बनारस की ठेठ पुरानी वास्तुकला का जीवंत नमूना है। मेकर्स का मानना था कि किसी स्टूडियो में सेट लगाकर वह तनाव, सन्नाटा और मध्यमवर्गीय संघर्ष का माहौल पैदा नहीं किया जा सकता था जो बनारस के इस पुराने मकान में खुद-ब-खुद महसूस होता है। यही वजह है कि वेब सीरीज के तीनों सीजन्स से लेकर 'मिर्जापुर: द मूवी' तक, मेकर्स ने इसी रियल लोकेशन पर गुड्डू के घर के सारे अंदरूनी और बाहरी भावनात्मक सीन्स शूट किए।
संकरी गलियों में उमड़ता था फैंस का हुजूम, संभालना होता था मुश्किल
बनारस की गलियां अपनी संकीर्णता के लिए दुनिया भर में जानी जाती हैं। जब भी बड़े पर्दे की फिल्म के लिए अली फजल, राजेश तैलंग और शीबा चड्ढा इस लोकेशन पर शूटिंग के लिए पहुंचते थे, तो पूरे मोहल्ले की छतों और बालकनियों पर हजारों फैंस का हुजूम जमा हो जाता था।
क्रू मेंबर्स के अनुसार, भारी-भरकम कैमरे, क्रेन और लाइट सेटअप को इन पतली गलियों से अंदर ले जाना किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था। अली फजल को देखने के लिए स्थानीय युवा 'गुड्डू भैया... गुड्डू भैया' के नारे लगाते थे। इस जबरदस्त पब्लिक प्रेशर और भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच अली फजल को अपने किरदार की हिंसक और डार्क मानसिकता में डूबना पड़ता था।
शूटिंग के वक्त सेट पर साए की तरह मौजूद रहते थे ये 'दो खास लोग'
'मिर्जापुर: द मूवी' की शूटिंग के दौरान सेट पर अली फजल के साथ मौजूद रहने वाले दो खास चेहरों की चर्चा यूनिट के बीच हमेशा रही। ये दो शख्स कोई और नहीं, बल्कि उनके लोकल बॉडी डबल-कम-ट्रेनर (फिजिकल फिटनेस गाइड) और बनारस के स्थानीय डायलेक्ट कोच (बोली मार्गदर्शक) थे।
1. लोकल फिटनेस व एक्शन ट्रेनर: गुड्डू पंडित का किरदार अपनी भारी-भरकम कद-काठी, चौड़े कंधों और लंगड़ाकर चलने के खास अंदाज के लिए मशहूर है। फिल्म की शूटिंग के दौरान अली फजल को लगातार भारी एक्शन, भागदौड़ और बंदूक चलाने के लंबे शॉट्स देने पड़ते थे। इस दौरान उनके शरीर के पोस्चर, लिंपिंग वॉक (लंगड़ाने का बॉडी लैंग्वेज) और मसल्स पंप को मेंटेन रखने के लिए उनके खास लोकल ट्रेनर हर टेक के बाद डंबल्स और रेसिस्टेंस बैंड्स लेकर उनके साथ खड़े रहते थे, ताकि स्क्रीन पर गुड्डू का खूंखार अंदाज एक सेकेंड के लिए भी ढीला न पड़े।
2. स्थानीय बोली और लहजे के जानकार (डायलेक्ट गाइड): दूसरा सबसे खास शख्स वह स्थानीय भाषा विशेषज्ञ था जो बनारसी और मिर्जापुरी बोली के महीन अंतर को भली-भांति समझता था। पूर्वांचल की बोली में हर दो कोस पर शब्दों का वजन और टोन बदल जाती है। 'मिर्जापुर: द मूवी' के लिए जब अली फजल कोई लंबा मोनोलॉग या गुस्से से भरा डायलॉग बोलते थे, तो यह लोकल गाइड मॉनिटर के बगल में हेडफोन लगाकर बैठता था। जैसे ही किसी शब्द में बनावटीपन या मुंबईया हिंदी की झलक आती, वह तुरंत अली फजल को टोककर ठेठ देसी मिजाज में सुधार करवाता था। इन्हीं दोनों लोगों की पर्दे के पीछे की मौजूदगी ने अली फजल के प्रदर्शन को इतना धारदार और असरदार बनाए रखा।
जब रियल लोकेशन बन जाती है कहानी का मुख्य किरदार
सिनेमा विशेषज्ञों का मानना है कि 'मिर्जापुर' की यूएसपी सिर्फ उसकी हिंसा या गाली-गलौज नहीं है, बल्कि उस अंचल की मिट्टी की खुशबू है। बनारस की उन सीलन भरी दीवारों, संकरी गलियों और पुश्तैनी घरों ने गुड्डू पंडित के किरदार को एक ऐसी जमीन दी, जिससे दर्शक खुद को भावनात्मक रूप से जोड़ पाए। यही कारण है कि जब बड़े पर्दे पर 'मिर्जापुर: द मूवी' में गुड्डू अपने उसी पुराने घर के दरवाजे पर खड़ा नजर आता है, तो दर्शकों को थिएटर्स में रोंगटे खड़े कर देने वाला रोमांच महसूस होता है।