गुरु पुष्य योग और अधिकमास का महा-संयोग: आज शाम करें ये उपाय, बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा
India News Live,Digital Desk : आज ज्येष्ठ अधिकमास का पांचवां दिन है और इस विशेष माह में 'गुरु पुष्य योग' का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र को 'नक्षत्रों का राजा' माना जाता है। हालांकि अधिकमास के दौरान खरीदारी और मांगलिक कार्यों की मनाही होती है, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति, पूजा-पाठ और दान-पुण्य के लिए यह समय अत्यंत शुभ और फलदायी है। आज के दिन की गई पूजा और उपाय विशेष रूप से मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद दिलाने वाले माने गए हैं।
अधिकमास में दीपदान का विशेष महत्व
अधिकमास (मलमास) को भगवान विष्णु का प्रिय महीना कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे महीने में दीपदान करना बेहद पुण्यदायी होता है। भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है, इसलिए शाम के समय तुलसी के समक्ष, घर के मुख्य द्वार पर, किसी मंदिर में या पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाना चाहिए। माना जाता है कि इस दौरान किया गया दीपदान भगवान विष्णु की विशेष कृपा दिलाता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
गुरु पुष्य योग: अष्टलक्ष्मी को प्रसन्न करने का महा-उपाय
आज 21 मई को गुरु पुष्य योग का संयोग है, जो धन की देवी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए सर्वोत्तम है। इस शुभ दिन पर अष्टलक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय का उल्लेख मिलता है:
आठ बाती का दीपक: आज शाम संध्या आरती के बाद मां लक्ष्मी के समक्ष आटे का दीपक तैयार करें। इस दीपक में आठ बत्तियां जलाएं। माना जाता है कि ऐसा करने से 'अष्टलक्ष्मी' प्रसन्न होती हैं और घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती।
भगवान विष्णु की पूजा: पुष्य नक्षत्र में बृहस्पति देव को पीले चने, हल्दी और गुड़ अर्पित करना चाहिए। इसके साथ ही श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से करियर और व्यापार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और उन्नति के नए मार्ग खुलते हैं।
आज के दिन का आध्यात्मिक फल
गुरु पुष्य योग में किया गया दान और पूजा सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फल देने वाली मानी जाती है। अधिकमास में धर्म-कर्म का विशेष प्रभाव होता है, जो ग्रहों के दुष्प्रभाव को शांत करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने में मदद करता है। आज के दिन सच्ची श्रद्धा से की गई पूजा और दीपदान न केवल आत्मिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि पितृ दोष से मुक्ति और सांसारिक बंधनों से रक्षा का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।