BCI चेयरमैन को दो टूक- 'आप सिर्फ प्रो-टैम अध्यक्ष हैं, नीतिगत फैसलों के लिए लेनी होगी AG और SG की अनुमति'
भारतीय न्यायपालिका और वकीलों के सर्वोच्च नियामक निकाय बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI की कार्यप्रणाली को लेकर देश की शीर्ष अदालत ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के लंबे और विवादित कार्यकाल तथा उनके जरिए लिए जा रहे फैसलों पर कड़ी नकेल कस दी है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ ने वकीलों के इस सबसे बड़े संगठन के कामकाज को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने दो टूक शब्दों में यह साफ कर दिया है कि मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल अनिश्चित काल तक यानी साल 2030 तक नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वे लोकतांत्रिक तरीके से उस पद पर दोबारा नहीं चुने गए हैं, बल्कि वे केवल एक कार्यवाहक यानी प्रो-टैम चेयरमैन की भूमिका निभा रहे हैं। इस अदालत के आदेश के बाद कानूनी हलकों में खलबली मच गई है और इसे मनन मिश्रा के लंबे वर्चस्व को एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
इस पूरे कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि पर अगर नजर डाली जाए तो पिछले कुछ महीनों के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया के फैसलों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे। कुछ समय पहले हैदराबाद की प्रतिष्ठित एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी में हुए एक दीक्षांत समारोह के दौरान छात्रों और संस्थान के घटनाक्रम को लेकर BCI की तरफ से कुछ तीखे आदेश जारी किए गए थे। उन आदेशों के तहत छात्रों के नामांकन और वकालत के पंजीकरण को रोकने जैसी बातें सामने आई थीं, जिसकी देश भर के विधि विशेषज्ञों और वकीलों ने कड़ी आलोचना की थी। हालांकि बढ़ते विरोध और तीखी प्रतिक्रिया के बाद BCI को अपने कई फैसलों से पीछे हटना पड़ा था और माफी भी मांगनी पड़ी थी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह उजागर कर दिया कि नियामक संस्था के भीतर किस प्रकार मनमाने तरीके से फैसले लिए जा रहे हैं। इसी मनमानी और नियमों को ताक पर रखकर कार्यकाल बढ़ाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनमें यह मांग की गई थी कि BCI के भीतर लोकतांत्रिक परंपराओं को बहाल किया जाए और तय नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: 'आप लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुने गए, सिर्फ कार्यवाहक अध्यक्ष हैं'
सुप्रीम कोर्ट में जब इन याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई तो अदालत ने कड़े शब्दों में BCI के वर्तमान नेतृत्व से कई तीखे सवाल पूछे। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकीलों ने अदालत को बताया कि एडवोकेट्स एक्ट और BCI के नियमों के मुताबिक चेयरमैन और उपाध्यक्ष का कार्यकाल अमूमन दो साल का होता है। इसके बावजूद अप्रैल 2025 में एक विशेष अधिसूचना जारी कर मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल सीधे साल 2030 तक बढ़ा लिया गया, जो पूरी तरह से नियमों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव टालने और सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए संक्रमणकालीन प्रावधानों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पर सुनवाई करते हुए बेंच के न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि मनन कुमार मिश्रा का पद किसी भी हाल में एक नियमित रूप से लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए चेयरमैन जैसा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी साफ किया कि चूंकि राज्य बार काउंसिलों के चुनाव हाल ही में संपन्न हो चुके हैं, इसलिए नई चुनी हुई बॉडी का गठन होना अब अनिवार्य हो गया है। जब तक नई और पूर्ण रूप से निर्वाचित बार काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन नहीं हो जाता, तब तक मनन कुमार मिश्रा केवल और केवल रोजमर्रा के प्रशासनिक और सामान्य कामकाज देखने के लिए एक प्रो-टैम चेयरमैन बने रह सकते हैं। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि इस अंतरिम व्यवस्था का फायदा उठाकर कोई भी दूरगामी या बड़ा नीतिगत निर्णय अकेले नहीं लिया जा सकता। वकीलों के सर्वोच्च निकाय में शक्ति के विकेंद्रीकरण और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और प्रभावी तंत्र स्थापित कर दिया है, जिसके तहत अब हर नीतिगत कदम पर कानूनी दिग्गजों की सीधी नजर रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस नए आदेश के अनुसार, अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) की सक्रिय सहमति और उपस्थिति के बिना नहीं ले पाएगी। अदालत ने कहा कि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल इस वैधानिक निकाय के पदेन सदस्य होते हैं, और जब भी देश भर के वकीलों या कानूनी शिक्षा से जुड़े किसी नीतिगत विषय पर विचार किया जाएगा, तो इन दोनों वरिष्ठ विधि अधिकारियों का शामिल होना अनिवार्य होगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रोजमर्रा के छोटे-मोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए अटॉर्नी जनरल की जरूरत नहीं है, लेकिन किसी भी बड़े निर्णय या नियम में बदलाव के वक्त उनकी मुहर लगना जरूरी कर दिया गया है। इस व्यवस्था से साफ है कि अब BCI के भीतर एक व्यक्ति विशेष के स्तर पर होने वाले एकतरफा फैसलों का दौर हमेशा के लिए समाप्त हो गया है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की राज्य बार काउंसिलों के पुनर्गठन और BCI के नए चुनावों की प्रक्रिया को एक तय समयसीमा के भीतर पूरा करने का सख्त आदेश दिया है। अदालत ने विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया है कि वे दो सप्ताह के भीतर संबंधित राज्य बार काउंसिलों में दो महिला सदस्यों का मनोनयन पूरा करें। इसके बाद एक सप्ताह के भीतर राज्य बार काउंसिलों को अपनी नई संरचना की आधिकारिक अधिसूचना जारी करनी होगी। अधिसूचना जारी होने के अगले तीन सप्ताह के भीतर नवगठित राज्य बार काउंसिलों को अपने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और BCI के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करना होगा। यह पूरी चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद न केवल BCI का नया ढांचा सामने आ जाएगा, बल्कि वकीलों के इस प्रमुख निकाय को एक नया और लोकतांत्रिक रूप से चुना हुआ नेतृत्व भी मिल जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई आगामी 17 सितंबर के लिए तय की है, जिसमें अदालत उठाए गए कदमों और निर्देशों के पालन की स्थिति की समीक्षा करेगी। इस पूरे घटनाक्रम ने देश की कानूनी बिरादरी में यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे संस्थानों में भी पारदर्शिता और नियमों का पालन सर्वोपरि है और किसी भी प्रकार की मनमानी को कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा।