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September 03 2026 12:07 am

18 साल से क्यों अटका है गोपनीयता का मामला? EVM 'टोटलाइजर' पर SC का केंद्र से सवाल और असली पेच

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इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से वोटों की गिनती के दौरान मतदाताओं की गोपनीयता सुरक्षित रखने से जुड़े 'टोटलाइजर' (Totaliser) के इस्तेमाल का मामला पिछले 18 वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस लंबे विलंब पर गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब तलब किया है। कोर्ट ने यह जानना चाहा है कि जब यह उपकरण मतदाताओं की पहचान और उनकी गोपनीयता को सुरक्षित रखने में मददगार साबित हो सकता है, तो फिर इसे लागू करने के रास्ते में कानूनी या व्यावहारिक रुकावटें क्यों हैं। चुनाव आयोग (ECI) लंबे समय से इसके इस्तेमाल की मांग करता रहा है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान के चलते यह मामला लगभग दो दशकों से अटका हुआ है।

क्या है 'टोटलाइजर' और यह कैसे काम करता है?

मशीनों को जोड़ना: टोटलाइजर एक ऐसा उपकरण है जिसे केबल के जरिए ईवीएम से जोड़ा जाता है। यह एक साथ कई (आमतौर पर 14) मतदान केंद्रों या बूथों की मशीनों के वोटों को आपस में मिला (पूल कर) देता है।

परिणाम का स्वरूप: इसके जरिए केवल यह पता चलता है कि उन 14 बूथों को मिलाकर कुल कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले, लेकिन यह सामने नहीं आता कि किसी विशेष या एक अकेले बूथ पर मतदाताओं ने किसे वोट दिया।

गोपनीयता की सुरक्षा: वर्ष 2007 में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) ने इसका सफल प्रदर्शन किया था। इसका मुख्य उद्देश्य चुनाव के बाद होने वाले राजनीतिक प्रतिशोध, उत्पीड़न, डराने-धमकाने और पक्षपात के खतरों को खत्म करना है।

असली पेच कहां फंसा है? (क्यों अटका है मामला)

कानूनी प्रावधानों का अभाव: चुनाव संचालन नियम, 1961 या जनप्रतिनिधि कानून में ईवीएम के लिए टोटलाइजर के इस्तेमाल का कोई स्पष्ट प्रावधान या अनुमति नहीं है। पूर्व में पेपर बैलेट के लिए नियम 59ए होता था, वैसी व्यवस्था ईवीएम के लिए नहीं जोड़ी गई।

बूथ-वार सत्यापन (Form 17C) की चुनौती: चुनाव आयोग और अन्य जानकारों का तर्क है कि यदि 14 मशीनों के वोटों को एक साथ मिला दिया जाए, तो फॉर्म 17सी के जरिए होने वाला बूथ-वार मिलान और VVPAT पर्चियों का क्रॉस-चेक मुश्किल हो जाएगा। किसी एक मशीन में तकनीकी या मानवीय गड़बड़ी होने पर उसकी पहचान छिपा जाएगी।

राजनीतिक दलों का विरोध: वर्ष 2016 में मंत्रियों के एक समूह (GoM) ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। राजनीतिक दलों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि बूथ-वार वोटिंग के आंकड़े यह समझने में मदद करते हैं कि किस क्षेत्र में विकास कार्यों की अधिक जरूरत है या किस इलाके में पार्टी की स्थिति कैसी है। अधिकांश राजनीतिक दल इसके पक्ष में नहीं रहे हैं।

सुरक्षा संबंधी चिंताएं: केंद्र सरकार ने पूर्व में अदालत में यह तर्क भी दिया था कि टोटलाइजर के इस्तेमाल के लिए मशीनों की सीलिंग और खोलने की प्रक्रिया में बदलाव करना होगा, जिससे तकनीकी सुरक्षा और डेटा लीक होने का जोखिम बढ़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि मतदाताओं की निजता और सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक विस्तृत हलफनामा दाखिल कर बताए कि पिछले 18 वर्षों से इस पर निर्णय क्यों नहीं लिया गया है और क्या चुनाव संचालन नियमों में संशोधन कर इसे कानूनी जामा पहनाया जा सकता है। साथ ही, अदालत ने चुनाव आयोग को भी यह सुझाव दिया है कि वह इस मामले में सरकार और संसद के समक्ष नए सिरे से अपना प्रस्ताव रखे, ताकि चुनावी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जा सके।