दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़ा उलटफेर, भारत के लिए रणनीतिक अवसर और पाकिस्तान की बढ़ी टेंशन
India News Live,Digital Desk : रूस और तालिबान के बीच हुए हालिया सैन्य सहयोग समझौते ने दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। मास्को में 'इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम' के दौरान अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब और रूसी सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु की उपस्थिति में हुए इस समझौते को रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।
समझौते की अहमियत और मास्को का रुख
सोवियत-अफगान युद्ध के कड़वे इतिहास को पीछे छोड़ते हुए, रूस ने तालिबान के साथ 'पूर्ण साझेदारी' की दिशा में यह बड़ा कदम उठाया है। सर्गेई शोइगु ने न केवल तालिबान के साथ सैन्य सहयोग पर मुहर लगाई, बल्कि पश्चिमी देशों से तालिबान पर लगे प्रतिबंध हटाने की भी अपील की। उनका तर्क है कि अफगानिस्तान में 20 वर्षों की मौजूदगी के बाद पश्चिमी देशों को वहां की स्थिति के लिए जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
भारत के लिए रणनीतिक अवसर
रूस और तालिबान की बढ़ती नजदीकी को भारत के लिए रणनीतिक रूप से सकारात्मक माना जा रहा है, जिसके कई कारण हैं:
पाकिस्तान के प्रभाव को चुनौती: अफगानिस्तान में अब तक पाकिस्तान का प्रभाव काफी गहरा रहा है, जो अक्सर भारत के हितों के विरुद्ध जाता है। रूस की मौजूदगी इस संतुलन को बदल सकती है और पाकिस्तान के एकाधिकार को चुनौती दे सकती है।
कनेक्टिविटी: भारत लंबे समय से पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशिया तक सीधी कनेक्टिविटी बनाना चाहता है। रूस का सक्रिय होना इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए मददगार साबित हो सकता है।
क्षेत्रीय संतुलन: यह समझौता अफगानिस्तान के पूरी तरह से केवल चीन या पाकिस्तान के प्रभाव क्षेत्र (Sphere of Influence) में जाने के जोखिम को कम करता है।
पाकिस्तान की बढ़ती असहजता
यह समझौता पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन गया है। पिछले कुछ समय में तालिबान और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहद निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।
सीमा पर तनाव: विवादित डूरंड रेखा पर ड्रोन हमले, क्रॉस-बॉर्डर शेलिंग और टीटीपी (TTP) जैसे संगठनों को पनाह देने के आरोपों ने दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ा दी हैं।
शक्ति का संतुलन: रूस के सक्रिय हस्तक्षेप से काबुल की स्थिति मजबूत होगी, जिससे पाकिस्तान का 'प्रेशर पॉइंट' के रूप में इस्तेमाल होने वाला प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। रूस की सैन्य-तकनीकी सहायता का मतलब है कि तालिबान अब काबुल के सैन्य ढांचे को आधुनिक बना सकेगा, जिससे इस्लामाबाद पर दबाव और बढ़ेगा।
समझौते का संभावित दायरा
हालांकि समझौते की आधिकारिक शर्तें गोपनीय हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक सहायता और रक्षा तकनीकी सहयोग जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं।