June 22 2026 12:13 am

दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत फारस की खाड़ी से रवाना: US-ईरान तनाव के बीच अमेरिका का बड़ा सामरिक कदम

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India News Live,Digital Desk : मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भारी तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण सैन्य घटनाक्रम सामने आया है। दुनिया का सबसे विशाल और अत्याधुनिक विमानवाहक पोत USS जेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford) अब फारस की खाड़ी और मध्य पूर्व के पानी से विदा लेकर वापस अमेरिका की ओर लौट रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में कूटनीतिक गतिरोध बना हुआ है।

सैन्य रणनीति में बदलाव या सामान्य रोटेशन?

USS जेराल्ड आर. फोर्ड पिछले 10 महीनों से अधिक समय से इस क्षेत्र में तैनात था। इसकी तैनाती का मुख्य उद्देश्य ईरान की 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में नाकेबंदी को चुनौती देना और अमेरिकी हितों की रक्षा करना था।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस पोत की वापसी को दो नजरियों से देखा जा रहा है:

रणनीतिक बदलाव: राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन अब इस क्षेत्र में "स्थायी भारी सैन्य मौजूदगी" के बजाय अधिक गतिशील (Dynamic) और कम खर्चीली रणनीति अपना सकता है।

रखरखाव और राहत: लंबे समय तक समुद्र में रहने के बाद जहाज की मरम्मत और नौसैनिकों को राहत देना एक सामान्य प्रक्रिया है।

बातचीत में गतिरोध और बढ़ती अनिश्चितता

विमानवाहक पोत की वापसी ऐसे समय हुई है जब कूटनीतिक रास्ते लगभग बंद नजर आ रहे हैं।

प्रस्तावों पर असहमति: हाल ही में ईरान द्वारा पाकिस्तान के जरिए भेजे गए नए शांति प्रस्ताव को राष्ट्रपति ट्रंप ने अपर्याप्त बताकर खारिज कर दिया है।

होर्मुज की संवेदनशीलता: होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है। इस पोत के हटने से सुरक्षा का वैक्यूम पैदा होने की आशंका है, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ सकता है।

क्या अमेरिका पीछे हट रहा है?

पोत की वापसी का मतलब यह कतई नहीं है कि अमेरिका ने क्षेत्र को अकेला छोड़ दिया है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार:

क्षेत्र में अभी भी USS ड्वाइट डी. आइजनहावर जैसे अन्य युद्धपोत और परमाणु पनडुब्बियां तैनात हैं।

अमेरिका ने अपनी 'स्ट्राइक कैपेबिलिटी' को बरकरार रखा है ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई की जा सके।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव

फारस की खाड़ी से सबसे बड़े युद्धपोत का हटना अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए एक मिला-जुला संकेत है। एक तरफ यह तनाव कम होने की उम्मीद जगाता है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक समाधान न होने के कारण यह भविष्य में फिर से सक्रिय युद्ध छिड़ने का डर भी पैदा करता है। यदि ईरान ने इस मौके का फायदा उठाकर नाकेबंदी सख्त की, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें फिर से आसमान छू सकती हैं।