Akhilesh Yadav took blessings from Swami Avimukteshwarananda: बोले "शंकराचार्य के साथ से अब 'नकली संतों' का होने जा रहा अंत"

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India News Live,Digital Desk : समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुरुवार को लखनऊ के कृष्णा नगर क्षेत्र में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात की। इस मुलाकात के सियासी और धार्मिक मायने काफी गहरे माने जा रहे हैं, खासकर तब जब शंकराचार्य पूरे देश में 'गौ माता' को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए अभियान चला रहे हैं।

"शंकराचार्य का आशीर्वाद ही असली शक्ति"

मुलाकात के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए अखिलेश यादव ने सत्ता पक्ष और धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों पर तीखा हमला बोला।

नकली संतों पर प्रहार: अखिलेश यादव ने कहा, "मैं महाराज जी से आशीर्वाद लेने आया था। आगे बढ़ने से पहले यदि शंकराचार्य का आशीर्वाद मिल जाए तो उससे बड़ा कुछ नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके आशीर्वाद से अब देश में 'नकली संतों' का अंत होने जा रहा है।"

गौ सेवा का संकल्प: गौ रक्षा अभियान पर बात करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि सपा सरकार के दौरान गायों की सेवा के लिए कई बड़े फैसले लिए गए थे और भविष्य में भी वे इस सेवा के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे।

मुलाकात की मुख्य बातें: सादगी और सम्मान

प्रतिनिधिमंडल: अखिलेश यादव के साथ पूर्व सांसद अन्नू टंडन और सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी भी मौजूद थे।

अभिवादन: शंकराचार्य के निवास पर पहुंचते ही अखिलेश यादव ने वहां मौजूद सभी संतों का हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर अभिवादन किया।

समर्थन का संदेश: यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब जनवरी 2026 के प्रयागराज माघ मेला के दौरान प्रशासन और पुलिस के साथ शंकराचार्य के विवाद ने काफी तूल पकड़ा था, जिस पर अखिलेश यादव ने सरकार की कड़ी निंदा की थी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का 'गोरक्षा अभियान'

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 8 मार्च को वाराणसी से इस अभियान का शंखनाद किया था और 11 मार्च को वे लखनऊ पहुंचे।

राष्ट्रमाता का दर्जा: उनका मुख्य उद्देश्य गाय को भारत की 'राष्ट्रमाता' घोषित करवाना और देश भर में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना है।

प्रशासनिक शर्तें: अखिलेश यादव ने इससे पहले लखनऊ में शंकराचार्य की सभा के लिए सरकार द्वारा लगाई गई कड़ी शर्तों पर भी सवाल उठाए थे और इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार बताया था।

सियासी मायने: ब्राह्मण और सनातन वोट बैंक पर नजर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की शंकराचार्य से यह नजदीकी भाजपा के 'हिंदुत्व' कार्ड के मुकाबले खुद को एक 'सच्चे सनातनी' के रूप में पेश करने की कोशिश है। शंकराचार्य के साथ खड़े होकर वे यह संदेश देना चाहते हैं कि वे परंपरा और धर्म के शीर्ष नेतृत्व का सम्मान करते हैं, जबकि वर्तमान सत्ता के साथ उनके मतभेद केवल नीतियों और आचरण को लेकर हैं।