2 बजे के बाद निफ्टी 24,000 के नीचे धड़ाम, कच्चे तेल में लगी आग; ये हैं क्रैश के 5 बड़े कारण
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को दोपहर 2 बजे तक सब कुछ सामान्य दिख रहा था और बाजार पिछले दिनों की सुस्ती से धीरे-धीरे उबरने (रिकवरी) की कोशिश में लगा हुआ था। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक निफ्टी (Nifty) 24,214 के स्तर पर मजबूती से कारोबार कर रहा था और ऐसा लग रहा था कि आज निवेशक मुनाफे के साथ घर लौटेंगे। लेकिन दोपहर 2 बजे के ठीक बाद वॉशिंगटन से आई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक बेहद आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने पूरे वैश्विक और घरेलू वित्तीय बाजारों का रुख पलट दिया। ट्रंप के बयानों के कुछ ही मिनटों के भीतर दलाल स्ट्रीट पर हाहाकार मच गया और देखते ही देखते निफ्टी 24,000 का मनोवैज्ञानिक स्तर तोड़कर 23,845 अंक के निचले स्तर तक गोता खा गया। सेंसेक्स में करीब 1700 अंकों की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों के करोड़ों रुपये स्वाहा हो गए।
आखिर डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा क्या कहा, जिससे बाजार में मच गया कोहराम?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बेहद कड़ा और सैन्य कार्रवाई का रुख अपनाते हुए कहा, "हमने ईरान पर बहुत समय बर्बाद कर दिया है। मैं अब ईरान के साथ किसी भी तरह की कागजी डील नहीं चाहता। हम किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) रखने की अनुमति नहीं देंगे।"
ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने ईरान की सरकार को अयोग्य (Incompetent) बताते हुए एक बड़ा और सनसनीखेज एलान किया कि, "बीती रात हमने ईरान पर बहुत ताकत के साथ सैन्य हमला किया है।" ट्रंप के इस सीधे हमले वाले कबूलनामे ने वैश्विक बाजारों में इस बात का साफ संकेत दे दिया कि अमेरिका और पश्चिम एशिया के बीच तनाव अब तीसरे विश्व युद्ध या एक विनाशकारी आर्थिक संकट में बदल सकता है।
कारण 1: भू-राजनीतिक अनिश्चितता और 'अमेरिका-ईरान' सीधा टकराव
शेयर बाजार के अचानक इस कदर टूटने की सबसे पहली और मुख्य वजह है— ग्लोबल मार्केट में आई अचानक अनिश्चितता। जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का शीर्ष नेता किसी दूसरे परमाणु-सक्षम या तेल उत्पादक देश पर सीधे सैन्य हमले की पुष्टि करता है, तो बड़े संस्थागत निवेशक (FIIs) तुरंत रिस्क वाले एसेट्स (जैसे शेयर्स) से अपना पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। बुधवार को भी यही हुआ; निवेशकों ने अनिश्चितता के डर से भारी बिकवाली शुरू कर दी, जिसके चलते डॉव फ्यूचर्स (Dow Futures) भी एक झटके में 600 अंक से ज्यादा टूट गया।
कारण 2: होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल टैंकरों पर हमले और सप्लाई रुकने का खौफ
ट्रंप के बयानों के ठीक बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अचानक आग लग गई। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) 6.5 फीसदी की भारी उछाल के साथ 79 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। वहीं, भारतीय कमोडिटी बाजार में MCX Crude 7 फीसदी से ज्यादा चढ़कर 7,190 रुपये के ऊपर पहुंच गया।
तेल की कीमतों में इस अचानक तेजी की सबसे बड़ी वजह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में बढ़ा तनाव है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रूट से गुजर रहे कतर (Qatar) के एक एलएनजी (LNG) पोत और सऊदी अरब के एक बड़े तेल टैंकर पर अज्ञात हमले हुए हैं। चूंकि दुनिया का एक बहुत बड़ा तेल निर्यात इसी संकरे रास्ते से होता है, इसलिए यहां जरा सी भी रुकावट पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को ठप कर सकती है।
कारण 3: ईरान का पलटवार और कुवैत-बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा
बाजार में घबराहट और पैनिक तब और ज्यादा बढ़ गया जब ईरान के रक्षा मंत्रालय ने जवाबी कार्रवाई का एक बड़ा दावा कर दिया। ईरान ने दावा किया कि उसने मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए बहरीन (Bahrain) और कुवैत (Kuwait) में मौजूद अमेरिका के 85 सैन्य ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया है। हालांकि वैश्विक मीडिया द्वारा इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि की जा रही है, लेकिन इस तरह की भीषण युद्ध की खबरों ने एल्गोरिदम-बेस्ड ट्रेडिंग और रिटेल निवेशकों के बीच भारी घबराहट पैदा कर दी, जिससे दोपहर 2 बजे के बाद बिकवाली का प्रेशर दोगुना हो गया।
कारण 4: ओपेक प्लस (OPEC+) की रणनीति पर फिरा पानी, 'ओवर-सप्लाई' की जगह पैदा हुई 'शॉर्टेज'
कुछ दिनों पहले तक वैश्विक बाजार को उम्मीद थी कि कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण में रहेंगी, क्योंकि तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक प्लस (OPEC+) ने बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ाने का फैसला किया था। कई अन्य गैर-ओपेक देशों में भी कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ रहा था, जिससे वैश्विक बाजारों को राहत थी। लेकिन पश्चिम एशिया (Middle East) में अचानक भड़के इस युद्ध ने निवेशकों की सोच को पूरी तरह बदल दिया। अब बाजार में ज्यादा तेल आने की उम्मीद के बजाय, अचानक सप्लाई पूरी तरह ठप होने (सप्लाई चेन क्राइसिस) का डर पैदा हो गया है, जो शेयर बाजार की सेहत के लिए सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ।
कारण 5: ग्लोबल मार्केट्स में चौतरफा मंदी और सुरक्षित निवेश (Safe Haven) की ओर झुकाव
डोनाल्ड ट्रंप के इस कड़े सैन्य रुख का असर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि समूचे एशिया, यूरोप और अमेरिकी शेयर बाजारों पर भी देखा गया। दुनिया भर के प्रमुख शेयर सूचकांक देखते ही देखते 2 फीसदी तक टूट गए। युद्ध जैसी परिस्थितियों में निवेशक हमेशा इक्विटी मार्केट से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित ठिकानों (Safe Haven Assets) जैसे डॉलर इंडेक्स या ट्रेजरी बॉन्ड्स की तरफ रुख करते हैं। इसी बीच सोने (Gold) की कीमतों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखा गया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव 4,070 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गया, जो निवेशकों के री-बैलेंसिंग पोर्टफोलियो को दर्शाता है।
आम भारतीय निवेशकों पर इसका क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से आयात (Import) करता है। ऐसे में अगर वैश्विक बाजार में तेल इसी तरह महंगा होता रहा, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे सीधा असर घरेलू महंगाई और कंपनियों की इनपुट कॉस्ट (लागत) पर पड़ेगा। यही वजह है कि जब भी मिडल-ईस्ट में तनाव बढ़ता है, भारतीय शेयर बाजार सबसे पहले और सबसे तेज प्रतिक्रिया देता है। आने वाले दिनों में शेयर बाजार की चाल पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका और ईरान के बीच यह तनाव युद्ध का रूप लेता है या कूटनीतिक स्तर पर हालात शांत होते हैं।