'जो समाज अपना इतिहास नहीं जानता, वह कभी तरक्की नहीं कर सकता', ओम प्रकाश राजभर का किस ओर था सीधा इशारा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी बेबाक बयानबाजी और आक्रामक शैली के लिए पहचाने जाने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर का एक ताजा बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। एक जनसभा और सामाजिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए राजभर ने दो टूक शब्दों में कहा कि 'जो समाज अपना इतिहास नहीं जानता, वह कभी तरक्की नहीं कर सकता।' उनका यह बयान केवल एक दार्शनिक या ऐतिहासिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी सियासी रणनीति, पिछड़े-दलित वर्गों की अस्मिता की लड़ाई और आगामी राजनीतिक समीकरणों को साधने की सोची-समझी योजना दिखाई देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजभर का यह बयान सीधे तौर पर अपने समाज को संगठित करने, गौरवशाली अतीत की याद दिलाकर राजनीतिक सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने और विपक्षी दलों द्वारा किए जाने वाले ऐतिहासिक उपेक्षा के आरोपों पर केंद्रित था।
1. महाराजा सुहेलदेव का गौरव और इतिहास की उपेक्षा पर प्रहार
ओम प्रकाश राजभर के इस बयान का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष संदर्भ 11वीं सदी के महान योद्धा महाराजा सुहेलदेव की विरासत से जुड़ा हुआ है।
राजभर समाज लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि मुख्यधारा के इतिहासकारों और पिछली सरकारों ने विदेशी आक्रांताओं का मानमर्दन करने वाले महाराजा सुहेलदेव के अदम्य साहस को इतिहास की किताबों में वह जगह नहीं दी जिसके वे हकदार थे। राजभर का इशारा इसी ओर था कि जब तक राजभर और अन्य वंचित जातियां अपने पुरखों के पराक्रम, स्वाभिमान और शासन व्यवस्था को नहीं समझेंगी, तब तक वे खुद को हीन भावना से मुक्त नहीं कर पाएंगी। उन्होंने कहा कि जिस कौम के पास राजाओं और विजेताओं का इतिहास रहा हो, वह आज सिर्फ वोट बैंक बनकर नहीं रह सकती।
2. 'सिर्फ वोट बैंक बनने' के खिलाफ सामाजिक चेतावनी
राजभर का इशारा अपने समाज की राजनीतिक चेतना को झकझोरने की तरफ था।
वे लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि आजादी के बाद दशकों तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों का इस्तेमाल केवल चुनाव जीतने की सीढ़ी के रूप में किया, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें उचित हिस्सेदारी, मंत्रालय और नीतिगत फैसले लेने का अधिकार नहीं दिया। 'इतिहास जानने' की बात कहकर राजभर ने अपने लोगों को आगाह किया कि वे अपने अतीत की गलतियों को याद रखें—किस तरह एकजुटता के अभाव में समाज हाशिए पर चला गया था। उन्होंने अपील की कि समाज को अपनी संख्या और ताकत को पहचानना होगा ताकि कोई भी दल उनका राजनीतिक शोषण न कर सके।
3. शिक्षा, अधिकार और बाबा साहेब के विचारों की गूंज
राजभर का यह विचार सीधे तौर पर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के उस प्रसिद्ध कथन से मेल खाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी अपना भविष्य नहीं बना सकती।'
राजभर ने मंच से अपने भाषण में शिक्षा और संगठित होने पर विशेष जोर दिया। उनका इशारा था कि केवल अतीत के गौरव के गुणगान से काम नहीं चलेगा, बल्कि उस इतिहास से प्रेरणा लेकर आज के नौजवानों को कलम उठानी होगी, उच्च शिक्षा प्राप्त करनी होगी और प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी जगह बनानी होगी। शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता ही वह रास्ता है जो इतिहास के गौरव को वर्तमान की हकीकत में बदल सकता है।
4. विरोधी दलों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति
उत्तर प्रदेश में राजभर समुदाय पूर्वांचल की दर्जनों सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
ऐसे में अपने कैडर और मतदाताओं को 'इतिहास और आत्मसम्मान' के नाम पर गोलबंद करना सीधे तौर पर अन्य प्रमुख दलों—विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस—के लिए एक चुनौती पेश करता है। राजभर यह संदेश देना चाहते हैं कि उनका समाज अब किसी के बहकावे में नहीं आने वाला और जो दल उनके ऐतिहासिक सम्मान, आरक्षण के वर्गीकरण (सब-कैटेगरी) और वास्तविक हिस्सेदारी की बात करेगा, समाज उसी के साथ खड़ा होगा। उनका यह बयान सामाजिक स्वाभिमान की आग जलाकर अपनी राजनीतिक बारगेनिंग पावर को चरम पर बनाए रखने का एक बेहद सटीक और आजमाया हुआ फॉर्मूला है।