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September 09 2026 06:28 pm

'सदाबहार दोस्ती' में आई दरार: जिस चीन पर पाकिस्तान को था भरोसा, उसी ने क्यों खींच लिए हाथ?

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दशकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को "शहद से मीठी, समुद्र से गहरी और हिमालय से ऊंची" बताने वाली चीन और पाकिस्तान की तथाकथित 'सदाबहार दोस्ती' (Ironclad Friendship) आज अपने सबसे बुरे और नाजुक दौर से गुजर रही है। जिस चीन को पाकिस्तान अपना सबसे बड़ा वित्तीय संकटमोचक, रणनीतिक ढाल और राजनीतिक संरक्षक मानता रहा है, उसी बीजिंग ने अब इस्लामाबाद से स्पष्ट दूरी बनानी शुरू कर दी है। अरबों डॉलर की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना की सुस्त रफ्तार, चीनी नागरिकों और इंजीनियरों पर लगातार होते आत्मघाती हमले, पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था और कर्ज माफी से चीन के दो टूक इनकार ने पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। बीजिंग के इस बदले मिजाज और कूटनीतिक बेरुखी ने यह साफ कर दिया है कि चीन का धैर्य अब जवाब दे चुका है।

1. चीनी नागरिकों की सुरक्षा पर समझौता नहीं: दासू से कराची तक बीजिंग का टूटा सब्र

दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट की सबसे पहली और सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान में काम कर रहे चीनी इंजीनियरों और कामगारों की लगातार हो रही हत्याएं हैं। चीन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना (पाकिस्तानी प्रतिष्ठान) चीनी नागरिकों को बुनियादी सुरक्षा देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है:

दासू हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट हमला: खैबर पख्तूनख्वा के बिशाम में चीनी इंजीनियरों के काफिले पर हुए आत्मघाती हमले में 5 चीनी नागरिकों की मौत ने बीजिंग को हिलाकर रख दिया था।

बलूचिस्तान और कराची में निशाने पर चीनी: बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) की माजिद ब्रिगेड ने ग्वादर पोर्ट, कराची यूनिवर्सिटी के कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट और चीनी वाणिज्य दूतावास को सीधे तौर पर निशाना बनाया है।

चीन ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान से मांग की कि वह अपनी सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ चीनी सुरक्षा कंपनियों को पाकिस्तान में हथियारबंद सुरक्षा दस्ते तैनात करने की अनुमति दे। पाकिस्तान के लिए अपनी ही संप्रभुता के भीतर किसी विदेशी देश की निजी सेना को इजाजत देना एक अपमानजनक और जटिल स्थिति बन गया, जिससे दोनों पक्षों में गहरा अविश्वास पैदा हुआ।

2. CPEC का दूसरा चरण ठप: खैरात बांटने के मूड में नहीं है बीजिंग

वर्ष 2015 में 62 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश के वादे के साथ शुरू हुआ 'चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर' (CPEC-1) ऊर्जा संयंत्रों और कुछ सड़कों के निर्माण के बाद पूरी तरह सुस्त पड़ चुका है।

स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZs) वीरान: CPEC के दूसरे चरण में प्रस्तावित नौ में से अधिकांश विशेष आर्थिक क्षेत्र केवल कागजों पर सिमटे हुए हैं।

बिजली कंपनियों का बकाया भुगतान: पाकिस्तान पर चीन के स्वतंत्र बिजली उत्पादकों (IPPs) का लगभग 1.5 से 2 अरब डॉलर से अधिक का भारी-भरकम बिजली बिल बकाया है। पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा की तंगी के चलते चीनी कंपनियों को उनका मुनाफा और पूंजी वापस देश नहीं भेजने दी जा रही है।

नतीजतन, चीन ने CPEC-2 के लिए नए फंड जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दिया है। बीजिंग ने साफ कर दिया है कि जब तक पहले के बकाए का भुगतान और पुराने प्रोजेक्ट्स का ऑडिट पूरा नहीं होता, तब तक कोई नया बड़ा निवेश जमीन पर नहीं उतरेगा।

3. कर्ज का अंतहीन दलदल: 'रोलओवर' तो मिला, लेकिन कर्जमाफी से साफ इनकार

पाकिस्तान वर्तमान में इतिहास के सबसे बदहाल आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पाकिस्तान के कुल विदेशी द्विपक्षीय कर्ज का लगभग 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले चीन का है।

जब पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज की मांग की, तो आईएमएफ ने शर्त रखी कि पाकिस्तान को चीनी कर्ज को री-स्ट्रक्चर (पुनर्गठित) कराना होगा।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने कई बार बीजिंग का दौरा कर चीनी नेतृत्व से कर्ज माफ करने या भुगतान की अवधि 5 से 8 साल बढ़ाने की गुहार लगाई।

चीन ने पाकिस्तान के 'सॉवरेन डिफॉल्ट' को टालने के लिए 2-3 अरब डॉलर के पुराने जमा को केवल तात्कालिक रूप से 'रोलओवर' (नवीनीकरण) किया, लेकिन भारी ब्याज दरों वाले कमर्शियल लोन को माफ करने या ब्याज दरों में भारी कटौती करने से दो टूक मना कर दिया।

चीन को यह डर है कि यदि उसने पाकिस्तान के लिए अपने 'सख्त कर्ज नियमों' में ढील दी, तो अफ्रीका और एशिया के अन्य 'कर्ज जाल' में फंसे देश भी इसी तर्ज पर डिफॉल्ट और कर्जमाफी की मांग करने लगेंगे।

4. अमेरिका और पश्चिम की ओर पाकिस्तान का झुकाव: बीजिंग को खटकती दोहरी चाल

चीन के मोहभंग की चौथी बड़ी वजह पाकिस्तान की विदेश नीति का गिरगिट जैसा बदलना है। पाकिस्तान की सैन्य कमान (रावलपिंडी जीएचक्यू) ने आर्थिक संकट से उबरने और आईएमएफ से ऋण पैकेज सुरक्षित कराने के लिए अमेरिकी प्रशासन और वाशिंगटन से नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी है।

यूक्रेन युद्ध के दौरान गोपनीय रूप से गोला-बारूद की आपूर्ति से लेकर पेंटागन के साथ रणनीतिक वार्ताओं तक, पाकिस्तान लगातार यह संदेश दे रहा है कि वह किसी भी एक खेमे का स्थायी पिछलग्गू नहीं बनना चाहता।

बीजिंग इस दोहरी चाल को भली-भांति समझता है। चीन यह कतई पसंद नहीं करता कि जिस रणनीतिक पार्टनर को उसने दशकों तक भारत के खिलाफ एक 'प्रॉक्सी' और पश्चिमी प्रभाव के मुकाबले क्षेत्रीय मोहरा बनाकर खड़ा किया, वही पार्टनर आर्थिक मदद के लिए बार-बार वाशिंगटन के सामने गिड़गिड़ाए।

5. बलूचिस्तान का बढ़ता असंतोष और ग्वादर का सपना टूटा

CPEC का मुकुट कहे जाने वाले 'ग्वादर गहरे पानी के बंदरगाह' (Gwadar Deep-Sea Port) की हकीकत भी बीजिंग के लिए भारी निराशा का कारण बनी है।

स्थानीय बलूच आबादी का मानना है कि उनकी जमीन और संसाधनों को चीन को औने-पौने दाम पर बेचा जा रहा है, जबकि स्थानीय युवाओं को रोजगार, पीने का साफ पानी और बिजली तक मयस्सर नहीं है।

मौलाना हिदायत-उर-रहमान के 'हक दो तहरीक' जैसे जनांदोलनों और बलूच अलगाववादी लड़ाकों के हमलों ने ग्वादर को एक हाई-सिक्योरिटी जेल के रूप में तब्दील कर दिया है।

जहाजों की आवाजाही न के बराबर है और चीनी व्यापार का जो सपना अरब सागर के जरिए मलक्का जलडमरूमध्य को बाईपास करने का देखा गया था, वह पूरी तरह सफेद हाथी साबित हो रहा है।

'बिना शर्त मदद' का युग खत्म: कारोबारी व्यावहारिकता पर उतरा चीन

आज का चीन अब माओ या शीतयुद्ध के दौर का वैचारिक दानदाता नहीं, बल्कि एक बेहद व्यावहारिक, पूंजीवादी और नफे-नुकसान को तौलने वाला वैश्विक खिलाड़ी है। बीजिंग समझ चुका है कि पाकिस्तान का शासन तंत्र भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत पतन का शिकार है, जहां फेंका गया पैसा किसी काले गड्ढे की तरह गायब हो जाता है। यही कारण है कि चीन ने पाकिस्तान के साथ मंच साझा करते हुए भले ही कूटनीतिक शिष्टाचार बनाए रखा हो, लेकिन रणनीतिक और आर्थिक रूप से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। पाकिस्तान के लिए यह अहसास सबसे दर्दनाक है कि जब उसे चीन की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब 'सदाबहार दोस्त' ने भी सिर्फ मुनाफे और सुरक्षा की भाषा में बात करना शुरू कर दिया है।