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September 22 2026 05:48 pm

मृत्यु के बाद शव के दोनों पैरों के अंगूठे क्यों बांधे जाते हैं गरुड़ पुराण में छिपा इसका आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य

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सनातन धर्म परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल सोलह संस्कारों का अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधान बताया गया है। इनमें से सबसे अंतिम और अत्यंत संवेदनशील संस्कार 'अंत्येष्टि' यानी अंतिम संस्कार कहलाता है। महर्षि वेदव्यास रचित अठारह महापुराणों में से एक 'गरुड़ पुराण' में जीवात्मा की मृत्यु, यमलोक की यात्रा, प्रेत योनि से मुक्ति और देह त्याग के पश्चात किए जाने वाले विभिन्न कर्मकांडों का सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन मिलता है। आज के आधुनिक युग में बहुत से लोग इन पारंपरिक क्रियाकलापों को केवल रूढ़िवादिता या अंधविश्वास मान लेते हैं, जबकि इनके पीछे गूढ़ आध्यात्मिक, ऊर्जात्मक और व्यावहारिक कारण मौजूद होते हैं। हिंदू धर्म में जब किसी व्यक्ति के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं, तो दाह संस्कार से पूर्व शव के दोनों पैरों के अंगूठों को एक सफेद सूती धागे या कुश की डोरी से आपस में बांध दिया जाता है। इस प्राचीन प्रथा के पीछे छिपे वास्तविक कारणों, वैदिक मान्यताओं और गरुड़ पुराण के स्पष्ट निर्देशों को समझना प्रत्येक जिज्ञासु के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गरुड़ पुराण का विधान: देह मोह से बंधी आत्मा को शरीर में दोबारा लौटने से रोकना

गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प के अनुसार, जब जीवात्मा भौतिक शरीर को छोड़कर निकलती है, तो उसका अपने पूर्व देह, परिवार और भौतिक सुखों के प्रति तुरंत मोह समाप्त नहीं होता है। आत्मा कई वर्षों तक उसी शरीर में रहकर सांसारिक क्रियाएं करती है, जिसके कारण देह त्यागने के बाद भी वह अपने नश्वर शरीर के इर्द-गिर्द मंडराती रहती है और दोबारा उसी शरीर में प्रवेश करने का निरंतर प्रयास करती है। शास्त्रों के अनुसार, पैरों के तलवे और अंगूठे शरीर के वे संवेदनशील ऊर्जा केंद्र माने जाते हैं जहां से सूक्ष्म तरंगे और प्राण ऊर्जा का संचार होता है। मृत्यु के तुरंत बाद जब दोनों पैरों के अंगूठों को आपस में बांध दिया जाता है, तो शरीर का वह ऊर्जा पथ स्थायी रूप से अवरुद्ध हो जाता है। इससे भटकती हुई आत्मा को यह बोध हो जाता है कि अब यह भौतिक देह निष्क्रिय हो चुकी है और इसमें दोबारा प्रवेश करना संभव नहीं है, जिससे आत्मा धीरे-धीरे अपनी अगली आध्यात्मिक यात्रा और परलोक गमन की ओर अग्रसर होती है।

 नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से निष्प्राण देह की सुरक्षा का चक्र

गरुड़ पुराण में यह भी रेखांकित किया गया है कि प्राण वायु निकल जाने के बाद मानव शरीर एक रिक्त पात्र की भांति हो जाता है। जब तक देह में आत्मा का वास रहता है, तब तक उसका अपना एक सुरक्षात्मक आभा मंडल (Aura) होता है जो बाह्य नकारात्मक शक्तियों को शरीर पर हावी नहीं होने देता। लेकिन मृत्यु के उपरांत शरीर पूरी तरह शून्य और रक्षाहीन हो जाता है। ऐसी अवस्था में वायुमंडल में विचरण करने वाली नकारात्मक शक्तियां, बुरी आत्माएं या पिशाच योनि की ऊर्जाएं उस खाली पड़े शरीर में प्रवेश करने या उसका दुरुपयोग करने की चेष्टा कर सकती हैं। पैरों के अंगूठे बांधने से शरीर के अधोभाग के सूक्ष्म ऊर्जा द्वार पूरी तरह सील हो जाते हैं, जिससे किसी भी तांत्रिक प्रभाव या बाह्य नकारात्मक सत्ता का देह में प्रवेश असंभव हो जाता है और पार्थिव शरीर दाह संस्कार तक पूर्णतः शुद्ध और सुरक्षित बना रहता है।

मांसपेशियों का खिंचाव और शरीर को स्थिर रखने का व्यावहारिक व वैज्ञानिक आधार

इस वैदिक परंपरा के पीछे आध्यात्मिक कारणों के अलावा ठोस वैज्ञानिक और शारीरिक कारण भी मौजूद हैं। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, मृत्यु के कुछ ही समय बाद शरीर में 'राइगर मॉर्टिस' (Rigor Mortis) यानी शव-अकड़न की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस दौरान शरीर की सभी मांसपेशियां सख्त होने लगती हैं और यदि अंगों को सही स्थिति में न रखा जाए तो वे विकृत मुद्रा में जम जाते हैं। पैरों के दोनों अंगूठों को बांध देने से दोनों पैर सीधे, संतुलित और परस्पर सटे रहते हैं। यदि अंगूठों को न बांधा जाए, तो अकड़न के कारण पैर बाहर की तरफ फैल सकते हैं, जिससे शव को अर्थी पर लिटाने, कफन से ढकने और श्मशान ले जाने में परिजनों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ सकता है। अंगूठे बांधने से शरीर एक अत्यंत शांत, सुव्यवस्थित और गरिमामयी मुद्रा में स्थिर रहता है।

 प्राण त्याग के समय भूमि पर लिटाने और दक्षिण दिशा में सिर रखने के नियम

गरुड़ पुराण के अनुसार, जब यह आभास हो जाए कि व्यक्ति के प्राण अब छूटने वाले हैं, तो उसे चारपाई या पलंग से उतारकर गोबर से लिपी हुई और कुश बिछी पवित्र भूमि पर लिटा दिया जाता है। इसका उद्देश्य यह होता है कि जीवात्मा सीधे पृथ्वी तत्व के संपर्क में आकर मोक्ष मार्ग की ओर बढ़े। इस दौरान मृतक का सिर सदैव दक्षिण दिशा की ओर और पैर उत्तर दिशा की ओर रखे जाते हैं, क्योंकि सनातन पंचांग और वास्तु शास्त्र में दक्षिण दिशा को मृत्यु के अधिपति यमराज की दिशा माना गया है। यम के दूतों की दिशा में सिर होने से जीवात्मा को शरीर त्यागने में सुगमता होती है। इसके साथ ही आत्मा की परम शांति, चित्त की शुद्धि और यम मार्ग में कष्टों से बचाव के लिए मृतक के मुख में गंगाजल की कुछ बूंदें, पवित्र तुलसी दल और स्वर्ण का एक छोटा कण रखने की शास्त्रीय परंपरा है, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

 स्नान, नवीन वस्त्र, सुहागिनों का शृंगार और अर्थी पर अंतिम महायात्रा की विधि

प्राण निकल जाने और अंगूठे बांधने के पश्चात मृतक के पार्थिव शरीर को विधिपूर्वक स्नान कराया जाता है। स्नान के जल में गंगाजल, तिल और सुगंधित द्रव्य मिलाए जाते हैं ताकि शरीर के बाह्य दोष समाप्त हो जाएं। इसके बाद शव को नए और स्वच्छ वस्त्र पहनाए जाते हैं। यदि किसी सौभाग्यवती (सुहागिन) महिला की मृत्यु होती है, तो उसे विधवा की भांति साधारण वस्त्रों में विदा नहीं किया जाता, बल्कि उसे लाल साड़ी पहनाकर, मांग में सिंदूर भरकर, महावर, बिंदी और चूड़ियों सहित पूरे सोलह शृंगार के साथ विदा किया जाता है, जो उसके अखंड सौभाग्य का प्रतीक होता है। इसके उपरांत बांस और पवित्र कुश घास से विधि-विधान पूर्वक अर्थी (टिकठी) तैयार की जाती है। पार्थिव शरीर को उस पर अत्यंत सम्मानपूर्वक लिटाकर नवीन कफन से आच्छादित किया जाता है। शव यात्रा के दौरान शरीर मार्ग में हिले-डुले या गिरे नहीं, इसके लिए उसे कच्चे सूत के मजबूत धागों से अर्थी के साथ कई स्थानों पर मजबूती से बांध दिया जाता है। इसके पश्चात राम नाम सत्य के उद्घोष के साथ अंतिम यात्रा निकाली जाती है और श्मशान घाट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मुखाग्नि देकर पंचतत्व से बने शरीर को पुनः पंचतत्व में विलीन कर दिया जाता है।