केरल के हिंदू किसे देते हैं वोट और क्यों नहीं बढ़ पा रही भाजपा? चुनावी आंकड़ों और सामाजिक समीकरणों
देश के हिंदी पट्टी राज्यों से लेकर पूर्वोत्तर और तटीय इलाकों तक अपनी चुनावी ताकत साबित कर चुकी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए केरल आज भी सबसे जटिल राजनीतिक पहेलियों में से एक बना हुआ है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में त्रिशूर सीट जीतकर पार्टी ने अपना खाता जरूर खोला और वोट शेयर में भी सुधार किया, लेकिन विधानसभा चुनावों में सरकार बनाने या प्रमुख विपक्षी दल बनने की स्थिति से पार्टी अब भी काफी दूर है। सवाल उठता है कि जिस राज्य में 54% से अधिक आबादी हिंदू है और जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं का देश में सबसे सघन नेटवर्क मौजूद है, वहां बहुसंख्यक हिंदू वोट भाजपा की झोली में क्यों नहीं आ पाता? राजनीतिक विश्लेषकों और सीएसडीएस-लोकनीति के आंकड़ों ने इसके पीछे की सामाजिक और राजनीतिक वजहों को स्पष्ट किया है।
केरल का सामाजिक ढांचा: एकजुट 'हिंदू वोट बैंक' का अभाव
केरल की राजनीति को उत्तर भारत के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यहां हिंदू समाज किसी एकमुश्त वोट बैंक के रूप में काम नहीं करता, बल्कि जातियों और वैचारिक आधार पर तीन मुख्य वर्गों में बंटा हुआ है:
एझवा (Ezhava) समुदाय (लगभग 23% आबादी): यह केरल का सबसे बड़ा हिंदू ओबीसी समुदाय है। नारायण गुरु के सामाजिक सुधार आंदोलन से उपजा यह वर्ग ऐतिहासिक रूप से वामपंथी दलों (LDF / CPI-M) की रीढ़ रहा है। भूमि सुधार, ट्रेड यूनियन और मजदूर आंदोलनों के चलते इस वर्ग का सीपीआई(एम) के साथ गहरा कैडर आधारित रिश्ता है।
नायर (Nair) समुदाय (लगभग 12-14% आबादी): उच्च जाति माना जाने वाला यह सवर्ण समुदाय पारंपरिक रूप से कांग्रेस (UDF) का मजबूत समर्थक रहा है। हालांकि, पिछले कुछ चुनावों में नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) के रुख और सबरीमाला आंदोलन के बाद इस वर्ग का एक हिस्सा भाजपा की ओर आकर्षित हुआ है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अब भी कांग्रेस और वामपंथ के बीच बंटा हुआ है।
दलित एवं अनुसूचित जातियां (लगभग 9-10%): समाज का यह तबका भी वामपंथी सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं और राशन-पेंशन व्यवस्था के चलते काफी हद तक लेफ्ट मोर्चे के साथ जुड़ा रहता है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी 4 चुनावी बाधाएं
विश्लेषकों के अनुसार, केरल में भाजपा के विस्तार को रोकने में मुख्य रूप से चार बड़े कारक काम करते हैं:
1. वामपंथ की गहरी सामाजिक पैठ और कैडर संस्कृति
केरल में सीपीएम केवल एक चुनावी पार्टी नहीं, बल्कि एक सामाजिक ढांचा है। लाइब्रेरी मूवमेंट, स्थानीय क्लब, कोऑपरेटिव बैंक और किसान-मजदूर यूनियनों के जरिए वामदलों का आम हिंदू परिवारों के दैनिक जीवन में दखल रहा है। आर्थिक और वर्ग-आधारित राजनीति ने यहां धार्मिक आधार पर लामबंदी को लंबे समय तक रोके रखा है।
2. यूडीएफ (UDF) का मजबूत सेक्युलर विकल्प
अगर कोई हिंदू मतदाता वामपंथ के शासन से नाराज होता है, तो उसके सामने कांग्रेस नीत यूडीएफ का एक आजमाया हुआ, मजबूत और व्यावहारिक विकल्प मौजूद रहता है। मतदाताओं को लगता है कि भाजपा को वोट देने से उनका वोट बेकार (Wasted Vote) हो सकता है, क्योंकि सरकार बनाने की सीधी लड़ाई हमेशा एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही रही है।
3. अल्पसंख्यकों का प्रभाव और रणनीतिक मतदान
केरल में मुस्लिम (लगभग 27%) और ईसाई (लगभग 18%) मिलकर कुल आबादी का लगभग 45% हिस्सा बनाते हैं। किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव जीतने के लिए अल्पसंख्यक मतों का समर्थन बेहद अहम होता है। जहां कांग्रेस और लेफ्ट दोनों को इन समुदायों का ठोस समर्थन मिलता है, वहीं भाजपा के खिलाफ अल्पसंख्यक मतदाताओं का एकजुट या रणनीतिक मतदान पार्टी की राह को कठिन बना देता है।
4. स्थानीय बनाम राष्ट्रीय नैरेटिव
केरल की साक्षरता दर, प्रवासी आबादी (गल्फ इकोनॉमी) और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य-शिक्षा प्रणाली के कारण यहां के मतदाता राष्ट्रीय हिंदुत्व के मुद्दों के बजाय स्थानीय शासन, सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं को प्राथमिकता देते हैं। भाजपा का आक्रामक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद केरल के मध्यमवर्गीय और शिक्षित हिंदू मानस में पूरी तरह से फिट नहीं बैठ पाता।
बदलते समीकरण: क्या त्रिशूर जीत के बाद टूटेगा चक्र?
हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि समीकरण धीरे-धीरे बदल रहे हैं:
वोट शेयर में लगातार बढ़त: भाजपा का वोट शेयर जो कभी 5 से 6 प्रतिशत पर अटका था, वह अब कई शहरी पॉकेट्स और दक्षिणी केरल में 15 से 20 प्रतिशत के दायरे में पहुंच चुका है।
ईसाई समुदाय के साथ नए समीकरण: मध्य केरल में कैथोलिक और अन्य ईसाई गुटों के साथ संवाद स्थापित कर भाजपा अपने सामाजिक आधार को सिर्फ हिंदुओं तक सीमित न रखकर एक नया गठबंधन बनाने की कोशिश में जुटी है।
युवा पीढ़ी में बदलाव: पुरानी कैडर राजनीति से इतर नई पीढ़ी रोजगार, विकास और स्टार्टअप्स के नाम पर राष्ट्रीय स्तर के विकल्पों की ओर देख रही है।
केरल का हिंदू मतदाता आज भी मुख्य रूप से लेफ्ट और कांग्रेस के बीच विभाजित है। जब तक भाजपा एझवा समुदाय और ग्रामीण पिछड़े वर्गों के बड़े हिस्से को वामपंथी प्रभाव से अलग करने और कांग्रेस के नायर आधार में बड़ी सेंध लगाने में सफल नहीं होती, तब तक केरल की सत्ता की चाबी उसके लिए एक कठिन चुनौती बनी रहेगी।