जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को दिया था श्राप, जानें क्यों श्रीहरि को लेने पड़े पृथ्वी पर अवतार
India News Live,Digital Desk : हिंदू धर्मग्रंथों में महर्षि भृगु का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र और 'भृगु-संहिता' के रचयिता महर्षि भृगु को वैदिक साहित्य में सूर्य के समान उज्ज्वल माना गया है। वैशाख पूर्णिमा के दिन जन्मे इस महान ऋषि से जुड़ी कई ऐसी कथाएं हैं, जो सृष्टि के संचालन और भगवान विष्णु के पृथ्वी पर अवतरण के रहस्यों को खोलती हैं। सबसे प्रचलित कथा वह है, जिसमें महर्षि भृगु ने स्वयं अपने दामाद और जगत के पालनहार भगवान विष्णु को श्राप दे दिया था।
पत्नी की हत्या से क्रोधित ऋषि ने दिया था श्राप
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवासुर संग्राम के दौरान असुरों ने देवताओं के भय से महर्षि भृगु के आश्रम में शरण ली। महर्षि उस समय वहां उपस्थित नहीं थे, उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नी ख्याति ने असुरों को अभयदान दिया और देवताओं से उनकी रक्षा की। जब भगवान विष्णु को यह ज्ञात हुआ कि असुरों को ऋषि के आश्रम में संरक्षण मिल रहा है, तो उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने सुदर्शन चक्र से ख्याति का मस्तक काट दिया।
जब महर्षि भृगु वापस लौटे और अपनी पत्नी की मृत देह देखी, तो वे शोक और क्रोध से भर गए। उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप देते हुए कहा कि जिस प्रकार उन्होंने एक स्त्री की हत्या की है, उसके दंड स्वरूप उन्हें बार-बार पृथ्वी लोक पर कष्ट सहने के लिए स्त्री के गर्भ से जन्म लेना पड़ेगा। माना जाता है कि इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु को राम और कृष्ण जैसे विभिन्न अवतार लेने पड़े।
जब ऋषि भृगु ने ली त्रिदेवों की परीक्षा
महर्षि भृगु से जुड़ी एक और रोमांचक कथा त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की परीक्षा की है। ऋषि समाज में यह प्रश्न उठा कि तीनों देवों में सबसे धैर्यवान और श्रेष्ठ कौन है? इसका निर्णय करने के लिए भृगु जी सबसे पहले ब्रह्मा जी और फिर शिव जी के पास गए, लेकिन उनके व्यवहार के कारण दोनों ही देव क्रोधित हो गए।
अंत में वे क्षीर सागर पहुंचे, जहां भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे। भृगु जी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनके वक्षस्थल (सीने) पर जोर से लात मारी। भगवान विष्णु की निद्रा टूटी, लेकिन वे क्रोधित होने के बजाय ऋषि के पैर सहलाने लगे और बोले, "हे ऋषिवर! मेरा वक्षस्थल कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों में चोट तो नहीं लगी?" श्रीहरि की इस क्षमाशीलता और धैर्य को देखकर भृगु जी ने उन्हें त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया।
अग्नि को दिया था 'सर्वभक्षी' होने का दंड
ऋग्वेद के अनुसार, महर्षि भृगु ही वह ऋषि थे जो अग्नि देवता से अग्नि प्राप्त कर पृथ्वी पर लाए थे और मनुष्यों को उसका उपयोग सिखाया था। हालांकि, एक अन्य प्रसंग में उन्होंने अग्नि को यह श्राप भी दिया था कि वह शुद्ध और अशुद्ध का विचार किए बिना 'सर्वभक्षी' (सब कुछ भक्षण करने वाली) हो जाएगी।
भृगु वंश और माता लक्ष्मी का संबंध
महर्षि भृगु का विवाह राजा दक्ष की पुत्री ख्याति से हुआ था। इन्हीं की पुत्री माता लक्ष्मी हैं, जिन्हें भृगु की पुत्री होने के कारण 'भार्गवी' भी कहा जाता है। इस नाते भगवान विष्णु महर्षि भृगु के दामाद भी हैं। भृगु जी के अन्य पुत्रों में धाता, विधाता और दैत्य गुरु शुक्राचार्य (काव्यामाता से जन्मे) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।