ट्रंप का कदम इतिहास का हिस्सा, ग्रीनलैंड को लेकर पहले भी उठे अमेरिकी प्रस्ताव

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India News Live,Digital Desk : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को डेनमार्क से खरीदने की इच्छा जताना हाल की ख़बरों में चर्चा का विषय रहा है, लेकिन यह वाक़ई कोई नई सोच नहीं है। दरअसल, अमेरिका ने इतिहास में कम से कम तीन मौकों पर ग्रीनलैंड को हासिल करने या खरीदने के विचार को गंभीरता से अपनाया है — और ट्रंप का आकर्षण इसी पुरानी नीति के सिलसिले में आता है। 

1. 1867‑1868: अलास्का खरीद के बाद पहली दिलचस्पी

अमेरिका ने रूसी साम्राज्य से अलास्का खरीदने के बाद आर्कटिक में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की। उस समय स्टेट सेक्रेटरी विलियम सुवार्ड ने ग्रीनलैंड में रूचि दिखाई क्योंकि यह क्षेत्र कोयला और अन्य संसाधनों से समृद्ध माना गया था। हालांकि, कांग्रेस ने इसे आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई और औपचारिक प्रस्ताव नहीं दिया गया। 

2. 1910: भूमि विनिमय प्रस्ताव

1910 में अमेरिकी अधिकारियों ने एक भूमि विनिमय योजना पेश की थी जिसमें ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने के लिए डेनमार्क के साथ कुछ भू‑भागों का आदान‑प्रदान करने का सुझाव था। इस प्रस्ताव को डेनमार्क ने अस्वीकार कर दिया, और यह प्रयास जल्दी ही समाप्त हो गया। 

3. 1946: ठंडे युद्ध के दौर में सोना‑आधारित प्रस्ताव

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोल्ड वॉर के शुरुआती सालों में, राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की सरकार ने डेनमार्क को $100 मिलियन सोना देकर ग्रीनलैंड खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव रखा था। इसका कारण यह था कि आर्कटिक का रणनीतिक महत्व — खासकर सैन्य और हवाई संचालन के लिए — युद्ध के बाद और बढ़ गया था। डेनमार्क ने पुनः यह सुझाव अस्वीकार कर दिया, लेकिन अमेरिका ने इलाक़े में अपने सैन्य अधिकार बनाए रखे, जिसमें अब भी पिटुफिक स्पेस बेस जैसे प्रमुख ठिकाने शामिल हैं। 

ट्रंप का रुझान इसी ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा

ट्रंप की हाल की टिप्पणियाँ और ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा उस ऐतिहासिक सोच से मेल खाती हैं जिसमें अमेरिका ने अक्सर इस स्थल को रणनीतिक दांव के रूप में देखा है। ग्रीनलैंड का स्थान आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में होने के साथ‑साथ कई प्राकृतिक संसाधनों और सैन्य महत्व के कारण सदियों से भू‑राजनीति में अहम रहा है।

हालाँकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने स्पष्ट कर दिया है कि द्वीप “बिकाऊ नहीं” है और उन्होंने संप्रभुता के अधिकारों पर जोर दिया है — जिससे इस प्रस्ताव का अब भी राजनयिक और संवैधानिक स्तर पर बड़ा विवाद कायम है।