जिस प्रस्ताव का भारत ने किया समर्थन, उसी से मिला झटका: UN के नए नक्शे में अरुणाचल और अक्साई चिन को दिखाया अलग
वैश्विक मंचों पर भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक आधिकारिक दस्तावेज और समझौते से संबंधित जारी किए गए नए वैश्विक नक्शे में भारत के अभिन्न अंग अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र को भारतीय सीमा से अलग प्रदर्शित किया गया है।
इस घटनाक्रम ने भारतीय कूटनीतिक गलियारों में गहरी नाराजगी और हलचल पैदा कर दी है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव और पहल के तहत यह तकनीकी मानचित्रण सामने आया है, भारत ने वैश्विक मंच पर पर्यावरण और सतत विकास के व्यापक हित को देखते हुए उस प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थन किया था। लेकिन उसी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज में देश की भौगोलिक सीमाओं को विवादित रूप में पेश किए जाने को कूटनीतिक रूप से एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
नक्शे में क्या की गई है गड़बड़ी? अलग रंग और डॉटेड लाइन्स से छेड़छाड़
संयुक्त राष्ट्र के संबंधित विभाग द्वारा जारी किए गए इस मानचित्र में भारत के भौगोलिक विस्तार को दर्शाते समय पुरानी और पक्षपातपूर्ण तकनीकों का सहारा लिया गया है:
अरुणाचल प्रदेश को अलग रंग: नक्शे में पूरे अरुणाचल प्रदेश को भारत के मुख्य नक्शे के रंग से अलग हल्के शेड में दर्शाया गया है, जिससे यह संदेश जाता है कि यह क्षेत्र भारत के निर्विवाद अधिकार क्षेत्र का हिस्सा नहीं है।
अक्साई चिन और पीओके पर लकीरें: लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र को भारतीय सीमा रेखा से काटते हुए दिखाया गया है, जबकि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (POK) को भी विवादित स्थिति वाली डॉटेड (डैश) लाइनों के भीतर बंद किया गया है।
चीन के दावों को अनजाने में हवा: इस तरह के चित्रण से सीधे तौर पर चीन के उस भ्रामक और विस्तारवादी नैरेटिव को ताकत मिलती है, जिसके तहत वह अरुणाचल प्रदेश को 'दक्षिण तिब्बत' (Zangnan) का हिस्सा बताने का दुस्साहस करता रहा है।
भारत ने किया था पहल का समर्थन, फिर कैसे हुई इतनी बड़ी चूक?
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत हमेशा से बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय मंचों और संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण, जैव विविधता और सतत विकास के साझा वैश्विक लक्ष्यों का समर्थक रहा है। संबंधित प्रस्ताव को पारित कराते समय भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना से अपनी सहमति दी थी।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र सचिवालय और उसकी मानचित्रण एजेंसियों (UN Geospatial Information Section) का यह पुराना ढर्रा रहा है कि वे सीमाओं को लेकर विवाद की स्थिति का हवाला देकर 'डिस्क्लेमर' (अस्वीकरण) लगा देते हैं। यूएन का मानक नियम कहता है कि नक्शों पर प्रदर्शित सीमाएं किसी देश की संप्रभुता की कानूनी पुष्टि नहीं करतीं। लेकिन इसके बावजूद इस प्रकार के नक्शे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और वैश्विक दस्तावेजों में छपने से अंतरराष्ट्रीय पटल पर गलत नजीर और भ्रम पैदा करते हैं।
भारत का कड़ा और दो टूक रुख: संप्रभुता से कोई समझौता नहीं
इस तरह के मामलों में भारत सरकार का रुख हमेशा से बेहद स्पष्ट, कड़ा और गैर-परक्राम्य (Non-Negotiable) रहा है। विदेश मंत्रालय (MEA) लगातार इस बात को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोहराता रहा है:
अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा: भारत ने कई मौकों पर स्पष्ट किया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अटूट और अविभाज्य हिस्सा है। किसी विदेशी नक्शे में रंग बदलने या फर्जी नामकरण करने से जमीनी सच्चाई कभी नहीं बदल सकती।
अक्साई चिन पर भारत का कानूनी दावा: लद्दाख का अक्साई चिन इलाका और पूरा जम्मू-कश्मीर व लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश भारत का संप्रभु क्षेत्र है, जिस पर किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा संशय पैदा करना अस्वीकार्य है।
संयुक्त राष्ट्र के समक्ष औपचारिक विरोध की तैयारी: नई दिल्ली स्थित राजनयिक सूत्रों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र में भारत का स्थायी मिशन (Permanent Mission of India to the UN) इस मानचित्रण विसंगति को लेकर संबंधित यूएन सचिवालय और एजेंसियों के समक्ष कड़ा औपचारिक विरोध (Strong Demarche) दर्ज कराने की प्रक्रिया में है।
संप्रभुता के मामलों में अंतरराष्ट्रीय सतर्कता की जरूरत
यह पहला मौका नहीं है जब किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन या वैश्विक मंच द्वारा भारत के गलत नक्शे का इस्तेमाल किया गया हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी पूर्व में ऐसे भ्रामक नक्शे जारी किए जा चुके हैं, जिन पर भारत के कड़े विरोध के बाद सुधार या स्पष्टीकरण जारी किए गए थे।
भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे भारत वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति मजबूत कर रहा है, अंतरराष्ट्रीय संधियों और दस्तावेजों के बारीक तकनीकी पहलुओं (Technical Footprints) पर भी देश को सख्त और सक्रिय निगरानी रखनी होगी ताकि कोई भी बहुपक्षीय पहल भारत की संप्रभु सीमाओं को धुंधला करने का जरिया न बन सके।