ग्लोबल वॉर का नया हथियार 'डिजिटल ब्लैकआउट': गैस और तेल के बाद अब इंटरनेट पर संकट, जानें कैसे एक झटके में गायब हो सकता है आप..का डेटा

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India News Live,Digital Desk : दुनिया इस वक्त युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, लेकिन अगला हमला शायद गोलियों या मिसाइलों से नहीं, बल्कि समुद्र की गहराइयों में होगा। रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व के संकट के बीच विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की अगली बलि 'इंटरनेट' हो सकता है। जिस तरह दुनिया ने गैस और तेल की किल्लत देखी है, ठीक वैसे ही अब 'डिजिटल ब्लैकआउट' का खतरा मंडरा रहा है। अगर समुद्र के नीचे बिछीं केबलों को निशाना बनाया गया, तो आपका स्मार्टफोन सिर्फ एक डिब्बा बनकर रह जाएगा और बैंकिंग से लेकर संचार तक सब कुछ ठप हो सकता है।

समुद्र की गहराइयों में छिपा है इंटरनेट का 'नर्वस सिस्टम'

अक्सर हमें लगता है कि इंटरनेट सैटेलाइट से चलता है, लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया का 99 प्रतिशत डेटा ट्रांसफर समुद्र के नीचे बिछी 'सबमरीन केबल्स' के जरिए होता है। ये केबलें ही महाद्वीपों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में दुश्मन देश अब इन केबलों को काटकर पूरे देश का संपर्क दुनिया से काट सकते हैं। यदि ये केबलें क्षतिग्रस्त होती हैं, तो गूगल, फेसबुक, वॉट्सऐप और क्लाउड स्टोरेज में रखा आपका कीमती डेटा पूरी तरह 'ऑफलाइन' हो सकता है, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन ध्वस्त हो जाएगी।

डेटा ब्लैकआउट: युद्ध का सबसे घातक और अदृश्य हथियार

गैस पाइपलाइनों पर हमलों के बाद अब रणनीतिकारों की नजर इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। इसे 'ग्रे ज़ोन वारफेयर' कहा जाता है, जहाँ बिना सीधे युद्ध के किसी देश की अर्थव्यवस्था को अपाहिज बनाया जा सकता है। एक छोटे से कट से शेयर बाजार क्रैश हो सकते हैं, जीपीएस सेवाएं बंद हो सकती हैं और अस्पतालों से लेकर सेना तक का डिजिटल ढांचा चरमरा सकता है। साइबर सुरक्षा जानकारों का कहना है कि यह खतरा अब केवल कल्पना नहीं रह गया है, बल्कि कई विकसित देश अपने अंडरवाटर केबल्स की सुरक्षा के लिए नौसेना को हाई अलर्ट पर रख रहे हैं।

क्या है बचने का रास्ता और कितनी है तैयारी?

इंटरनेट की इस 'बलि' को रोकने के लिए अब एलन मस्क के स्टारलिंक जैसे सैटेलाइट इंटरनेट प्रोजेक्ट्स को विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, सैटेलाइट इंटरनेट अभी इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह सबमरीन केबल्स की जगह ले सके। भविष्य में डेटा सुरक्षा के लिए 'डेटा सॉवरेन्टी' यानी अपने देश का डेटा अपने ही देश के सर्वर में रखने की मांग तेज हो गई है। विशेषज्ञों की सलाह है कि इस डिजिटल युग में अपनी निर्भरता पूरी तरह क्लाउड पर रखने के बजाय फिजिकल बैकअप के महत्व को भी समझना होगा, क्योंकि युद्ध की स्थिति में बिजली के बाद अगली बारी इंटरनेट की ही हो सकती है।