राधाष्टमी पर पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त सुबह 11:01 से दोपहर 1:28 बजे तक, भक्तों को मिलेगा 2 घंटे 27 मिनट का समय
सनातन धर्म और वैष्णव परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति, प्रेमावतार और आराध्या श्री राधा रानी का जन्मोत्सव 'राधा अष्टमी' के रूप में बड़े ही उल्लास और भक्तिभाव से मनाया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद आने वाला यह पावन पर्व इस वर्ष शनिवार, 19 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म जहां भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को हुआ था, वहीं श्री राधा रानी का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन दोपहर (मध्याह्न काल) में वृषभानु जी के महल में हुआ था। यही वजह है कि राधा अष्टमी की मुख्य पूजा और अभिषेक दोपहर के समय ही करने का शास्त्रीय विधान है। इस वर्ष साधकों को राधा रानी की आराधना और विशेष अनुष्ठान के लिए 2 घंटे 27 मिनट की अत्यंत शुभ समयावधि मिल रही है।
पूजा का सटीक समय: सुबह 11:01 से दोपहर 1:28 बजे तक रहेगा महामुहूर्त
वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणना के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर 2026 को दोपहर 01:00 बजे से हो चुकी है, जो 19 सितंबर 2026 को दोपहर 03:26 बजे तक प्रभावी रहेगी। चूंकि धर्मग्रंथों में मध्याह्न कालीन व्यापिनी अष्टमी तिथि में राधा रानी के प्राकट्य पूजन का निर्देश दिया गया है, इसलिए 19 सितंबर का दिन ही व्रत और उत्सव के लिए सर्वमान्य और सर्वोत्तम है।
पर्व तिथि: शनिवार, 19 सितंबर 2026
मध्याह्न पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: सुबह 11:01 बजे से दोपहर 01:28 बजे तक
पूजा के लिए कुल उपलब्ध समय: 2 घंटे 27 मिनट
अभिजीत मुहूर्त का संयोग: दोपहर 11:49 बजे से 12:38 बजे तक (इस दौरान पूजा का फल अनंत गुना हो जाता है)
इस 2 घंटे 27 मिनट की शुभ अवधि में साधक अपने घरों, मंदिरों या पूजा स्थलों पर राधा रानी का पंचामृत अभिषेक, विशेष श्रृंगार, छप्पन भोग अर्पण और आरती संपन्न कर सकते हैं।
राधा रानी की मध्याह्न पूजा विधि और नियम
राधा अष्टमी के दिन दोपहर के समय पूजा करते समय कुछ विशेष शास्त्रीय चरणों का पालन अवश्य करना चाहिए:
वेदी और प्रतिमा स्थापना: पूजा स्थान पर लाल या पीले रंग का रेशमी वस्त्र बिछाकर तांबे या मिट्टी का कलश स्थापित करें। उसके पास राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की संयुक्त प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पंचामृत से अभिषेक: शुभ मुहूर्त (सुबह 11:01 से दोपहर 01:28 बजे) में शंख या तांबे के पात्र से कच्चे दूध, दही, गंगाजल, घी और शहद के मिश्रण से श्रीजी का अभिषेक करें।
मनोहर श्रृंगार: अभिषेक के बाद श्री राधा रानी को नए वस्त्र पहनाएं, सुगंधित चंदन, रोली, अक्षत और विशेष रूप से लाल व पीले गुलाब के पुष्पों की माला अर्पित करें।
प्रिय भोग का अर्पण: राधा रानी को माखन-मिश्री, अरबी की सब्जी (घुइयां), मालपुआ, खोये की मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। उनके भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
मंत्र जप और स्तुति: पूजा के दौरान 'ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः' या 'राधे-राधे' नाम संकीर्तन करें। अंत में राधा चालीसा का पाठ कर घी के दीप से आरती उतारें।
क्यों बिना राधा पूजा के अधूरी मानी जाती है श्रीकृष्ण भक्ति?
पद्म पुराण और गर्ग संहिता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी दो अलग-अलग स्वरूप नहीं, बल्कि एक ही आत्मा के दो दिव्य अंग हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति श्रीकृष्ण की पूजा करता है लेकिन राधा रानी का ध्यान नहीं करता, तो उसकी भक्ति अधूरी और निष्फल मानी जाती है।
राधा जी भगवान श्रीकृष्ण के हृदय में वास करती हैं और भक्तों की प्रार्थना को प्रभु तक पहुंचाने का सीधा माध्यम बनती हैं। मान्यता है कि जो जातक इस 2 घंटे 27 मिनट के मध्याह्न काल में सच्चे मन से राधा रानी की शरण में जाता है, उसके दांपत्य जीवन के सारे क्लेश समाप्त हो जाते हैं, घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है और अंत समय में उसे गोलोक धाम की प्राप्ति होती है।
व्रत पारण का नियम
जो श्रद्धालु राधा अष्टमी का दिनभर का उपवास रखते हैं, वे मध्याह्न काल में पूजा और आरती संपन्न करने के बाद फलाहार ले सकते हैं। पूर्ण उपवास रखने वाले साधक अगले दिन नवमी तिथि (20 सितंबर) को प्रातः काल सूर्योदय के बाद ब्राह्मण या सुहागिन महिलाओं को भोजन कराकर और वस्त्र-दक्षिणा भेंट कर सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें।