Ganesh Visarjan 2026: 7वें दिन बप्पा को विदाई देने के लिए 20 सितंबर को 3 सबसे शुभ मुहूर्त
देशभर में धूमधाम से मनाए जा रहे गणेश जन्मोत्सव और गणेश चतुर्थी महापर्व का उल्लास अब अपने सातवें पड़ाव पर पहुंच चुका है। हिंदू सनातन परंपरा और लोकमान्यताओं के अनुसार, जो श्रद्धालु अपने घरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और पंडालों में सात दिनों के लिए मंगलमूर्ति श्री गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं, वे सातवें दिन अत्यंत श्रद्धा, भाव और भक्ति के साथ गजानन को विदाई देकर विसर्जित करते हैं। रविवार, 20 सितंबर 2026 को गणेश उत्सव का सातवां दिन पड़ रहा है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र और पंचांग गणना के अनुसार, इस दिन प्रातःकाल से लेकर देर रात तक तीन अत्यंत शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे, जिनके दौरान भक्त अपनी सुविधानुसार विघ्नहर्ता भगवान गणेश का विधि-विधान से विसर्जन कर सकते हैं।
वैदिक ज्योतिषियों और पंचांग मर्मज्ञों के अनुसार, चौघड़िया मुहूर्त का चयन विसर्जन के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है, क्योंकि चर, लाभ और अमृत की वेला में किया गया कोई भी धार्मिक कार्य घर-परिवार में सुख, समृद्धि, वैभव और शांति का वास सुनिश्चित करता है। 20 सितंबर 2026 को बप्पा को विदाई देने के लिए दिनभर में तीन प्रमुख शुभ काल उपस्थित हो रहे हैं। पहला महामुहूर्त सुबह 7 बजकर 42 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। यह लंबा समय चर, लाभ और अमृत काल की शुभ चौघड़ियों से युक्त है, जो नौकरीपेशा और पारिवारिक लोगों के लिए विसर्जन का सबसे उत्तम और कल्याणकारी समय माना गया है।
दोपहर और सायंकाल में भी मिलेंगे विसर्जन के उत्तम अवसर, चौघड़िया अनुसार चुनें समय
यदि किसी कारणवश परिवार सुबह के मुहूर्त में विसर्जन की तैयारी पूरी नहीं कर पाता है, तो पंचांग के अनुसार दूसरा श्रेष्ठ समय दोपहर में मिलेगा। दोपहर 1 बजकर 47 मिनट से लेकर 3 बजकर 18 मिनट तक का कालखंड 'शुभ' चौघड़िया के अंतर्गत आता है। इस समय में भी विधिवत गणपति आरती और भोग लगाकर भगवान गणेश की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जा सकता है। दोपहर का यह समय उन परिवारों के लिए विशेष रूप से अनुकूल है जो दोपहर के विशेष भोग और ब्राह्मण भोजन के बाद विसर्जन की परंपरा का पालन करते हैं।
दिन का तीसरा और अंतिम शुभ मुहूर्त शाम और रात्रि काल में पड़ेगा। जो श्रद्धालु सूर्यास्त के बाद संध्या आरती के साथ गाजे-बाजे और रोशनी के बीच बप्पा को विदा करना चाहते हैं, उनके लिए शाम 6 बजकर 21 मिनट से लेकर रात 10 बजकर 47 मिनट तक का समय अत्यंत फलदायी रहेगा। इस दौरान शुभ, अमृत और चर काल की त्रिवेणी सक्रिय रहेगी, जो धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत पावन मानी जाती है। इस विस्तृत समयावधि में श्रद्धालु पूरे विधि-विधान, पारंपरिक भजनों और 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' के जयघोष के साथ अपने आराध्य देव को विदाई दे सकते हैं।
विसर्जन से पहले की अनिवार्य षोडशोपचार पूजा: दूर्वा, मोदक और आरती से करें गजानन को प्रसन्न
शास्त्रों के अनुसार, विसर्जन का अर्थ केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करना नहीं है, बल्कि यह देवत्व को पुनः उनके मूल स्वरूप में लीन करने का एक अत्यंत आध्यात्मिक अनुष्ठान है। विसर्जन से ठीक पहले भगवान गणेश की विधिवत षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा करना अनिवार्य है। सबसे पहले बप्पा की प्रतिमा को जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं अथवा स्वच्छ, नवीन रेशमी वस्त्र से पोंछकर उनका नवीन श्रृंगार करें। इसके उपरांत भगवान गणेश को तिलक लगाएं, अक्षत, सिंदूर, लाल चंदन और ताजे सुगंधित पुष्प अर्पित करें। गजानन को 21 दूर्वा (दूब घास) की गांठें अवश्य चढ़ाएं, क्योंकि दूर्वा के बिना गणेश जी की पूजा अपूर्ण मानी जाती है।
श्रृंगार और तिलक के बाद बप्पा को उनके सबसे प्रिय भोग जैसे मोदक, मोतीचूर के लड्डू, केला, पंचमेवा और ऋतु फल अर्पित करें। घी का दीपक और सुगंधित धूप बत्ती जलाकर परिवार के सभी सदस्य मिलकर श्री गणेश जी की पारंपरिक आरती 'जय गणेश जय गणेश देवा' और 'सुखकर्ता दुखहर्ता' का श्रद्धापूर्वक गायन करें। आरती पूर्ण होने के बाद कपूर की आरती से घर को शुद्ध करें और भगवान से बीते सात दिनों में जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें। इसके बाद प्रतिमा को उसके स्थापित स्थान से थोड़ा सा हिलाकर विसर्जन का संकल्प लें।
कान में अपनी गुप्त मनोकामना बोलने का रहस्य और विसर्जन की विशेष पोटली तैयार करने की विधि
गणेश विसर्जन की वैदिक और पौराणिक परंपराओं में दो अत्यंत महत्वपूर्ण नियमों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें हर भक्त को जानना आवश्यक है। आरती और पूजन समाप्त होने के बाद परिवार के सभी सदस्यों को बारी-बारी से भगवान गणेश के दाहिने कान में अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक या आध्यात्मिक मनोकामना बहुत ही शांत मन और श्रद्धा से बोलनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश जब विसर्जित होकर अपने धाम लौटते हैं, तो अपने भक्तों की हर प्रार्थना सीधे भगवान शिव और माता पार्वती तक पहुंचाते हैं और उनकी मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है।
इसके साथ ही विसर्जन से पहले एक साफ पीले या लाल कपड़े की एक छोटी पोटली तैयार करने की शास्त्रीय परंपरा है। इस विसर्जन पोटली के भीतर बप्पा को अर्पित किए गए दूर्वा के कुछ तिनके, सुपारी, एक हल्दी की गांठ, थोड़े से अक्षत, एक सिक्का और थोड़ा सा सूखा मोदक या गुड़ रखकर पोटली को मौली (कलावा) से अच्छी तरह बांध दें। यह पोटली यात्रा के पाथेय (रास्ते के भोजन व सम्मान) का प्रतीक मानी जाती है, जिसे प्रतिमा के साथ ही जल में प्रवाहित किया जाता है।
घर पर ही इको-फ्रेंडली विसर्जन का श्रेष्ठ तरीका: प्रकृति की रक्षा के साथ पाएं विघ्नहर्ता का आशीर्वाद
आज के समय में पर्यावरण की शुचिता और जल स्रोतों की स्वच्छता को बनाए रखने के लिए घर पर ही इको-फ्रेंडली तरीके से विसर्जन करने की परंपरा को सबसे उत्तम और पुण्यदायी माना गया है। इसके लिए अपने घर के आंगन, छत या बालकनी में एक बड़ा, गहरा और पूरी तरह स्वच्छ पात्र (जैसे तांबे, पीतल या मिट्टी की परात या बाल्टी) लें। उस पात्र को शुद्ध जल से भर लें और उसमें थोड़ा सा गंगाजल, गुलाब की पंखुड़ियां, दुर्वा और थोड़ा सा चंदन का इत्र मिला लें।
इसके पश्चात भगवान गणेश की प्रतिमा को दोनों हाथों से आदरपूर्वक उठाकर 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारों के साथ उस जल से भरे पात्र में धीरे-धीरे पूरी श्रद्धा के साथ विसर्जित कर दें। जब मिट्टी की प्रतिमा जल में पूरी तरह घुल जाए, तो उस पावन जल और मिट्टी को किसी गमले, तुलसी के पौधे को छोड़कर घर के किसी अन्य फूलदार पौधे या बगीचे की क्यारियों में विसर्जित कर दें। इससे भगवान गणेश का आशीर्वाद और उनके स्पर्श से पावन हुई मिट्टी आपके घर-आंगन में सदैव समृद्धि और हरियाली बनकर विद्यमान रहेगी।