राधा रानी को बेहद प्रिय हैं ये 5 चीजें, पूजा की थाली में जरूर करें शामिल; बरसेगी बांके बिहारी और लाड़ली जी की असीम कृपा
सनातन धर्म और वैष्णव परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति, प्रेमावतार श्री राधा रानी का प्राकट्य उत्सव यानी 'राधा अष्टमी' हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण का हृदय राधा रानी में बसता है। जो भक्त लाड़ली जी को प्रसन्न कर लेता है, उस पर कन्हैया की कृपा स्वयंमेव बरसने लगती है। शास्त्रों और ब्रज की मान्यताओं में उल्लेख मिलता है कि राधा रानी अत्यंत भोली और करुणामयी हैं, लेकिन यदि उनके पूजन में उनकी प्रिय वस्तुओं को शामिल किया जाए, तो वे साधक पर तुरंत प्रसन्न होकर अखंड सौभाग्य, सुख-शांति और प्रेम का वरदान देती हैं। 19 सितंबर को राधा अष्टमी के पावन अवसर पर पूजा करते समय इन विशेष प्रिय चीजों को अर्पित करना न भूलें।
1. अरबी की सब्जी (घुइयां) का विशेष भोग
ब्रजमंडल, विशेषकर बरसाना और वृंदावन में राधा अष्टमी के दिन श्रीजी को अरबी (स्थानीय भाषा में घुइयां या कचालू) की सब्जी का भोग लगाने की सदियों पुरानी और अटूट परंपरा है।
धार्मिक मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी को अरबी की सूखी मसालेदार या दही वाली सात्विक सब्जी अत्यंत प्रिय है।
भोग का नियम: इस दिन बिना लहसुन-प्याज के देसी घी, अजवाइन और सेंधा नमक में अरबी की सब्जी तैयार कर पूड़ी या कचौड़ी के साथ राधा रानी को अर्पित की जाती है। माना जाता है कि इस भोग के बिना राधा अष्टमी का नैवेद्य अधूरा रहता है।
2. मालपुआ, रबड़ी और माखन-मिश्री
भगवान श्रीकृष्ण की तरह ही राधा रानी को भी दुग्ध उत्पादों और पारंपरिक मिष्ठानों से अत्यधिक लगाव है।
मालपुआ और रबड़ी: राधा अष्टमी की मध्याह्न पूजा में खोया, मैदा और सौंफ के मेल से बने कुरकुरे व रसीले मालपुए और गाढ़ी रबड़ी का भोग लगाया जाता है।
माखन-मिश्री: घर में निकाले गए गाय के ताजा माखन में धागे वाली मिश्री मिलाकर श्रीजी को अर्पित करने से घर में पारिवारिक प्रेम और दांपत्य जीवन की मिठास बनी रहती है।
3. नीले और पीले रंग के पुष्प (नीलकमल व अपराजिता)
राधा रानी को प्राकृतिक फूलों से गहरा प्रेम है। जहां भगवान कृष्ण पीतांबरधारी हैं, वहीं राधा रानी को नीला रंग (मेघ वर्ण) बेहद प्रिय है क्योंकि यह रंग कन्हैया के स्वरूप का स्मरण कराता है।
प्रिय पुष्प: पूजा में नीले रंग के कमल (नीलकमल), अपराजिता (विष्णुकांता), पीले कनेर और सुगंधित ताजे गुलाब के फूलों की माला श्रीजी को अर्पित करनी चाहिए।
गेंदे और चमेली के फूलों से झूला या उनकी चौकी सजाने से साधक के जीवन के सभी मानसिक संताप दूर हो जाते हैं।
4. सुगंधित प्राकृतिक इत्र (गुलाब, चंदन व मोगरा)
राधा रानी को सुगंध का वास माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, ब्रज की निकुंज गलियों में श्रीजी के आगमन से ही वातावरण सुगंधित हो उठता था।
इत्र अर्पण: पूजा के दौरान चांदी या शीशे की शीशी में शुद्ध गुलाब, मोगरा, चंदन या खस का प्राकृतिक इत्र लें और एक छोटी रुई के फाहे में लगाकर राधा रानी के चरणों में या उनकी प्रतिमा के वस्त्रों पर अवश्य लगाएं।
इससे घर का वास्तु दोष समाप्त होता है और सकारात्मक ऊर्जा व ऐश्वर्य में वृद्धि होती है।
5. सुहाग पिटारी और चुनरी (श्रृंगार सामग्री)
राधा रानी अखंड सौभाग्य और सौंदर्य की देवी हैं। इसलिए राधा अष्टमी के दिन उन्हें सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करने का विशेष विधान है।
श्रृंगार सामग्री: पूजा की थाली में लाल या पीले रंग की गोटा-पट्टी वाली रेशमी चुनरी, हरी या लाल कांच की चूड़ियां, कुमकुम (रोली), महावर (आलता), बिंदी, सिंदूर, काजल, पायल और इत्र शामिल करें।
सौभाग्य प्राप्ति: पूजन संपन्न होने के बाद इस सुहाग सामग्री को किसी सौभाग्यवती महिला या मंदिर के पुरोहित की पत्नी को ससम्मान भेंट कर दें। इससे वैवाहिक जीवन में आ रहे तनाव, विवाद या विवाह में हो रहे अनावश्यक विलंब से मुक्ति मिलती है।
तुलसी दल के साथ लगाएं सात्विक भोग
यद्यपि तुलसी जी भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं, लेकिन राधा रानी स्वयं श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। इसलिए राधा रानी के नैवेद्य में भी तुलसी का एक दल (पत्ता) अवश्य रखा जाना चाहिए। पूजा के समय 'ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः' अथवा 'जय राधे राधे' महामंत्र का जप करते हुए श्रद्धाभाव से ये सामग्री अर्पित करने से बांके बिहारी और राधा रानी दोनों का एक साथ आशीर्वाद प्राप्त होता है।