संकट में अकेली पड़ीं 'दीदी'! जानें कौन हैं TMC के वे 8 वफादार विधायक, जो आज भी थामे हैं ममता बनर्जी का दामन
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों मिली करारी और ऐतिहासिक हार के महज एक महीने के भीतर ही ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह और तख्तापलट की कोशिशों ने न केवल संगठन की नींव हिला दी है, बल्कि बंगाल की कद्दावर नेता ममता बनर्जी को अपने ही राजनीतिक जीवन में बिल्कुल अकेला और अलग-थलग कर दिया है।
इस भयंकर सियासी तूफान और 60 विधायकों की खुली बगावत के बीच, अब ममता बनर्जी के साथ केवल उनके कुछ गिने-चुने, पुराने और सबसे वफादार सिपाही ही ढाल बनकर खड़े नजर आ रहे हैं। सत्ता से बेदखल होने के बाद मंगलवार को जब ममता बनर्जी पहली बार अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने सड़कों पर उतरीं, तो उनके पीछे चलने वाले विधायकों की संख्या घटकर महज आठ (8) रह गई थी, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया।
ये हैं 'दीदी' के वे 8 वफादार विधायक, जिन्होंने बगावत के दौर में भी नहीं छोड़ा साथ
ममता बनर्जी के इस सबसे मुश्किल दौर में जो आठ विधायक उनके साथ डटे हुए हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं:
नैना बंद्योपाध्याय
फिरहाद हकीम (कोलकाता पोर्ट से विधायक)
कुणाल घोष
बिमान बंद्योपाध्याय
शोभनदेव चट्टोपाध्याय
मदन मित्रा (कमरहटी से विधायक)
अशोक देब (बज बज सीट से विधायक)
आशिमा पात्रा
विधायकों के अलावा, कुछ गिने-चुने सांसद भी इस दौरान ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई दिए, जिनमें डेरेक ओ'ब्रायन, कल्याण बनर्जी, डोला सेन, समीरुल इस्लाम, मेनका गुरुस्वामी और नदीमुल हक शामिल हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी को छोड़कर, साथ देने वाले बाकी सभी नेता राज्यसभा के सदस्य हैं, यानी जमीन पर लोकसभा सांसदों ने भी दीदी से दूरी बनाना शुरू कर दिया है।
1998 की स्थापना के समय के पुराने साथियों ने निभाया 'वफादारी का धर्म'
ममता बनर्जी के इस छोटे से खेमे में जो सबसे बड़ी ताकत है, वह है उनके पुराने साथी। मदन मित्रा, फिरहाद हकीम, शोभनदेव चट्टोपाध्याय और अशोक देब जैसे दिग्गज चेहरे साल 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के समय से ही ममता बनर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे हैं। संकट की इस घड़ी में उनकी इनसाइड प्रोफाइल कुछ इस तरह है:
मदन मित्रा: कमरहटी से फायरब्रांड विधायक मदन मित्रा टीएमसी सरकारों में कई भारी-भरकम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। पिछले कुछ सालों में भले ही उन्हें अभिषेक बनर्जी के उभार के कारण पार्टी में दरकिनार किया गया, लेकिन उन्होंने ममता के प्रति अपनी वफादारी नहीं बदली।
फिरहाद हकीम: कोलकाता पोर्ट से दोबारा जीत दर्ज करने वाले फिरहाद हकीम ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद माने जाते हैं। बुधवार को ही उन्हें कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा देने की अनुमति मिली है। ममता कैबिनेट में शहरी विकास, आवास और परिवहन जैसे बड़े पोर्टफोलियो संभाल चुके फिरहाद को ममता ने विधानसभा में 'मुख्य सचेतक' (Chief Whip) नियुक्त किया था, जिसे अब बागी विधायकों ने मानने से इनकार कर दिया है।
शोभनदेव चट्टोपाध्याय: शोभनदेव बंगाल की राजनीति के वो इकलौते और अजेय योद्धा हैं, जिन्होंने लगातार 10 बार विधानसभा चुनाव जीता है। साल 1998 के ऐतिहासिक उपचुनाव में वह टीएमसी के टिकट पर जीतने वाले पहले उम्मीदवार थे। वह कृषि, संसदीय कार्य और ऊर्जा जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का जिम्मा संभाल चुके हैं।
अशोक देब: कानून के जानकार और सात बार के वरिष्ठ विधायक अशोक देब साल 1996 से लगातार 'बज बज' विधानसभा सीट पर अपराजेय काबिज हैं और आज भी दीदी के साथ मजबूती से खड़े हैं।
नेता प्रतिपक्ष के चुनाव को लेकर क्यों भड़की यह महा-बगावत?
टीएमसी के भीतर की यह दरार उस समय पूरी तरह से कानूनी और राजनीतिक लड़ाई में तब्दील हो गई, जब पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 60 विधायकों (बागी गुट) ने ममता बनर्जी की तानाशाही के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। दरअसल, ममता बनर्जी ने अपने सबसे वफादार शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में 'नेता प्रतिपक्ष' (Leader of Opposition) के रूप में मनोनीत किया था।
लेकिन, बागी विधायकों ने ममता के इस एकतरफा फैसले को सरेआम खारिज कर दिया। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथींद्र बोस को एक आधिकारिक पत्र सौंपकर मांग की कि हाल ही में ममता द्वारा निष्कासित किए गए कद्दावर नेता ऋतब्रत बनर्जी को ही विधानसभा में नया नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए। हालांकि, अपनी रणनीति के तहत बागियों ने यह जरूर कहा है कि ममता बनर्जी अब भी उनकी सर्वोच्च नेता हैं, लेकिन वे उनके फैसलों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
अभी और गहराएगा संकट, सांसदों में भी टूट की आशंका तेज
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों का साफ कहना है कि आने वाले दिनों में ममता का साथ छोड़ने वाले बागी विधायकों की संख्या 60 से बढ़कर और ज्यादा हो सकती है। इसके साथ ही, अब यह बगावत दिल्ली तक पहुंचने वाली है, क्योंकि टीएमसी के सांसदों में भी इसी तरह की बड़ी फूट की आशंका तेज हो गई है।
इसकी शुरुआत भी हो चुकी है— बारसात से लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पहले ही सीधे तौर पर ममता और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर उंगली उठाते हुए पार्टी के सभी सांगठनिक पदों से अपना इस्तीफा दे दिया है। काकोली के इस कदम से साफ है कि आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस का यह आंतरिक संकट पार्टी को पूरी तरह खत्म करने की कगार पर ले जा सकता है।