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September 07 2026 06:16 am

7 सितंबर अजा एकादशी: शाम को इन 5 पवित्र स्थानों पर जरूर जलाएं दीपक, जानें पूजा की सबसे सरल और सटीक विधि

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सनातन परंपरा में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए सर्वोत्तम माना गया है। 7 सितंबर को अजा एकादशी का पावन पर्व पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी तिथि पर व्रत और जप के साथ-साथ संध्याकाल में किए जाने वाले दीपदान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि एकादशी की शाम को विधिपूर्वक किया गया दीपदान जातक के कुल के संचित पापों का अंधकार मिटाकर जीवन में सुख, ऐश्वर्य और ज्ञान का प्रकाश भरता है। यदि आप भी इस पावन तिथि पर भगवान विष्णु और मां महालक्ष्मी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो शाम ढलते ही 5 मुख्य स्थानों पर दीपक अवश्य प्रज्वलित करें और सरल शास्त्रीय विधि से पूजा संपन्न करें।

7 सितंबर अजा एकादशी: शाम को इन 5 स्थानों पर जरूर जलाएं दीपक

संध्याकाल (गोधूलि वेला) में सही स्थान पर दीपदान करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकलती है और स्थिर लक्ष्मी का वास होता है:

तुलसी चौबारे के पास: एकादशी की शाम को तुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का एक दीपक अवश्य जलाएं। दीपक में कलावे की बाती का प्रयोग करें और उसमें एक चुटकी पिसी हल्दी डाल दें। ध्यान रखें कि इस दिन तुलसी जी को स्पर्श न करें और न ही जल चढ़ाएं।

घर के मुख्य द्वार (दहलीज) पर: घर का मुख्य दरवाजा मां लक्ष्मी का प्रवेश मार्ग माना जाता है। सूर्यास्त के तुरंत बाद मुख्य द्वार के दोनों कोनों पर घी अथवा तिल के तेल का एक-एक दीपक रखें। दीपक का मुख बाहर की तरफ होना चाहिए।

घर के पूजा मंदिर (ईशान कोण) में: पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा के सम्मुख अखंड या नौ मुखी घी का दीपक जलाएं। यह दीपक रात भर जलता रहे तो अत्यंत शुभ माना जाता है।

पीपल के वृक्ष के नीचे: यदि घर के आसपास पीपल का वृक्ष हो, तो शाम ढलने से पूर्व वहां जाकर सरसों के तेल या तिल के तेल का एक चौमुखी दीपक जलाएं और अपनी आर्थिक तंगी दूर करने की प्रार्थना करें।

रसोई घर में जल रखने के स्थान पर: वास्तु शास्त्र और धर्म ग्रंथों के अनुसार, रसोई में पीने के पानी का स्थान पितरों का वास माना जाता है। यहां शाम के समय शुद्ध घी का एक छोटा दीपक जलाने से पितृ दोष शांत होता है और अन्न-धन की बरकत बनी रहती है।

अजा एकादशी की सबसे आसान और अचूक पूजा विधि

यदि आपके पास विस्तृत कर्मकांड का समय नहीं है, तो आप अत्यंत सरल और प्रामाणिक विधि से भी श्रीहरि का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं:

प्रातः स्नान और संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय स्नान करें। स्वच्छ पीले या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें और हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प लें।

वेदी तैयार करें: पूजा घर में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

पंचामृत व गंगाजल से अभिषेक: यदि लड्डू गोपाल या शालिग्राम जी हैं, तो उन्हें गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं।

पीले चंदन और वस्त्र से श्रृंगार: श्रीहरि को पीले चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत (बिना टूटा चावल) के स्थान पर तिल का प्रयोग करें और पीले पुष्प व तुलसी दल अर्पित करें।

भोग समर्पण: भगवान को मौसमी पीले फल (जैसे केला), मखाने या केसरयुक्त खीर का नैवेद्य लगाएं। भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य रखें (तुलसी का पत्ता एकादशी के दिन न तोड़ें, एक दिन पूर्व का तोड़ा हुआ पत्ता प्रयोग करें)।

मंत्र जप और आरती: आसन पर बैठकर तुलसी की माला से कम से कम 108 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का शांत मन से जप करें। इसके बाद अजा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और अंत में कपूर जलाकर आरती करें।