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September 16 2026 03:18 pm

ऋषि पंचमी व्रत कथा: जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति दिलाती है यह पावन कथा, जानें धार्मिक महत्व और नियम

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सनातन धर्म परंपरा में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में 15 सितंबर, मंगलवार के दिन यह पावन पर्व श्रद्धापूर्वक संपन्न किया जा रहा है। शास्त्रों में ऋषि पंचमी के व्रत को किसी विशेष देवी-देवता की उपासना के बजाय हमारे मूल संवाहक पूज्य सप्तऋषियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और जीवन में जाने-अनजाने में हुए रजस्वला दोष, शारीरिक अशुद्धियों तथा मानसिक पापों के प्रायश्चित का महापर्व बताया गया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषि पंचमी के दिन नियमपूर्वक व्रत रखने के साथ-साथ इसकी पावन व्रत कथा का श्रवण या पठन करना अनिवार्य माना गया है। बिना कथा सुने व्रत का संपूर्ण पुण्य फल प्राप्त नहीं होता। यह पावन कथा न केवल पूर्व जन्म के कर्मों के प्रभाव को स्पष्ट करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि विधिपूर्वक किया गया पश्चाताप और ऋषियों का वंदन मनुष्य के जीवन से बड़े से बड़े कष्ट का निवारण कर देता है।

विदर्भ देश के ज्ञानी उत्तंक ब्राह्मण और उनके परिवार का त्याग

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्राचीन काल में विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक परम तपस्वी और धर्मात्मा ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी सुशीला के साथ निवास करते थे। उत्तंक मुनि अपने ज्ञान, संयम और सत्यनिष्ठा के लिए संपूर्ण क्षेत्र में विख्यात थे। ब्राह्मण दंपत्ति के दो संतानें थीं—एक कुशाग्र बुद्धि पुत्र जिसका नाम सुविभूषण था और एक सुशील व संस्कारी कन्या। पुत्र सुविभूषण ने अल्पायु में ही चारों वेदों और वेदांगों का गूढ़ अध्ययन पूरा कर लिया था, जिससे परिवार का यश चारों दिशाओं में फैल गया था।

कन्या के विवाह योग्य होने पर उत्तंक मुनि ने अपनी भार्या सुशीला के परामर्श से उसका विवाह एक सुयोग्य, कुलीन और विद्वान ब्राह्मण कुमार के साथ विधि-विधान से संपन्न कर दिया। परंतु विधि का विधान कुछ और ही था। विवाह के महज एक माह के भीतर ही उस कन्या के पति का आकस्मिक देहावसान हो गया और वह अल्पायु में ही विधवा हो गई। कन्या के इस असीम वियोग और वैधव्य दुख से उत्तंक मुनि और उनकी पत्नी का हृदय विदीर्ण हो गया।

कन्या ने वैधव्य धर्म को स्वीकार कर शांत मन से अपने पिता के घर में रहकर धर्म का पालन करना शुरू किया। अपनी लाडली के निरंतर दुख को देखकर उत्तंक मुनि का मन सांसारिक प्रपंचों से विरक्त हो गया। उन्होंने अपने गृहस्थी का संपूर्ण भार अपने ज्ञानी पुत्र सुविभूषण को सौंप दिया और अपनी पत्नी व विधवा कन्या को साथ लेकर पवित्र गंगा के तट पर प्रस्थान कर गए। वहां उन्होंने एक शांत कुटीर बनाई और ब्रह्मचर्य व वेदाध्ययन के आश्रम की स्थापना की, जहां अनेक शिष्य उनसे वेदों का ज्ञान प्राप्त करने लगे।

शरीर पर पड़े कीड़े: कन्या की रहस्यमयी पीड़ा और माता का विलाप

गंगा तट पर स्थित आश्रम में वह साध्वी कन्या अत्यंत निष्ठापूर्वक अपने धर्म का पालन करते हुए नित्य प्रति अपने वृद्ध माता-पिता और ऋषियों की सेवा में लीन रहती थी। आश्रम की व्यवस्था, अतिथियों का सत्कार और पिता के पूजन की सामग्री जुटाने में वह दिन-रात एक कर देती थी।

एक दिन आश्रम के समस्त कार्यों को पूरा करने के बाद वह अत्यधिक थक गई। अत्यंत थकान और अशक्तता के कारण वह विश्राम करने के उद्देश्य से गंगा तट पर स्थित एक विशाल शिला पर लेट गई। थकान के अतिरेक में उसे अपनी शारीरिक सुध-बुध भी न रही और वह गहरी निद्रा में सो गई।

उसी रात अर्धरात्रि के समय अचानक एक विचित्र और कष्टकारी घटना घटी। उस सोई हुई कन्या के संपूर्ण शरीर में एकाएक असंख्य कीड़े उत्पन्न हो गए और वे उसकी त्वचा को विदीर्ण करने लगे। प्रात:काल जब आश्रम के शिष्यों ने शिला पर लेटी कन्या की यह वीभत्स और पीड़ादायक दशा देखी, तो वे भयभीत होकर उत्तंक मुनि की कुटिया की ओर दौड़े। शिष्यों की बात सुनकर माता सुशीला छाती पीटती और कातर स्वर में विलाप करती हुई उस शिला की ओर भागी।

अपनी नित्य धर्मात्मा और पवित्र कन्या के शरीर को कीड़ों से भरा देखकर सुशीला वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ी। कुछ समय पश्चात जब उन्हें चेत आया, तो उन्होंने अत्यंत वात्सल्य और अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी अचेत कन्या को गोद में उठाया और रोते हुए अपने पति उत्तंक मुनि के सम्मुख लाकर रख दिया।

उत्तंक मुनि की दिव्य दृष्टि और कन्या के पूर्व जन्म का दोष

अपनी कन्या की ऐसी अमानवीय और असह्य दुर्दशा देखकर माता सुशीला ने हाथ जोड़कर अपने पति से विलाप करते हुए पूछा—"हे स्वामिन! आप त्रिकालदर्शी हैं, वेदों के ज्ञाता हैं। कृपा करके मुझे बताइए कि मेरी इस निष्पाप, साध्वी और धर्मपरायण कन्या ने ऐसा कौन सा घोर पाप किया था, जिसके फलस्वरूप भरी जवानी में पहले इसका सुहाग उजड़ा और अब इसके पवित्र शरीर पर ऐसे भयंकर कीड़े रेंग रहे हैं?"

पत्नी के अत्यंत करुण वचनों को सुनकर उत्तंक मुनि अत्यंत शांत और अंतर्मुखी हो गए। उन्होंने अपने नेत्र बंद किए और योग समाधि में लीन होकर कन्या के पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का अनुसंधान करने लगे। दिव्य दृष्टि से कन्या के पूर्व जन्म के वृत्तांत को जानने के उपरांत मुनि ने गंभीर वाणी में नेत्र खोलकर कहा:

"हे प्रिय सुशीले! धैर्य धारण करो। कर्म की गति अत्यंत गूढ़ और अटल होती है। हमारी यह कन्या अपने पूर्व जन्म में भी एक उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्मी थी। किंतु उस जन्म में इससे अनजाने में एक भारी धर्मभ्रष्टता हुई थी। यह एक बार रजस्वला (मासिक धर्म) की अवस्था में थी। शास्त्रों के नियमों की अनदेखी करते हुए इसने उसी अशुद्ध अवस्था में रसोई और घर के जलपात्रों (घड़े आदि बर्तनों) को स्पर्श कर लिया था। उस समय अनजाने में किए गए उस रजस्वला दोष और मर्यादा उल्लंघन के फलस्वरूप ही आज इसके शरीर में ये कीड़े उत्पन्न हुए हैं।"

मुनि ने आगे रहस्य स्पष्ट करते हुए कहा—"इसने उस जन्म में शुद्धि स्नान के उपरांत अपनी सखियों को भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन ऋषि पंचमी का पावन व्रत करते देखा था। व्रत के दर्शन मात्र के प्रभाव से इसे इस जन्म में हमारे जैसे ब्रह्मतेजोमय कुल में जन्म प्राप्त हुआ, परंतु उस समय इसने उस महान व्रत का स्वयं आदर नहीं किया और उसका तिरस्कार कर दिया। उस पवित्र व्रत के अनादर और रजस्वला दोष के संयुक्त पाप कर्मों के कारण ही आज यह इस दारुण कष्ट को भोग रही है।"

ऋषि पंचमी व्रत का अक्षय महात्म्य और पाप मुक्ति का विधान

उत्तंक मुनि की बात सुनकर माता सुशीला आश्चर्यचकित रह गईं और हाथ जोड़कर बोलीं—"हे मुनिवर! जिस व्रत के मात्र दूर से दर्शन करने से इसे उत्तम कुल में जन्म मिला, उस चमत्कारी व्रत का संपूर्ण विधान क्या है? कृपा करके मुझे उस महान व्रत की विधि और महिमा बताएं, जिससे मेरी पुत्री के इस घोर पाप का प्रायश्चित हो सके और यह इस असहनीय कष्ट से मुक्त हो जाए।"

उत्तंक मुनि ने प्रसन्न होकर बताया—"हे सुशीले! ऋषि पंचमी का व्रत समस्त व्रतों में मुकुटमणि है। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विधिपूर्वक किया जाता है। इस दिन व्रती को प्रातःकाल पवित्र नदियों में स्नान कर अपामार्ग (चिचड़ी) की दातून करनी चाहिए और शरीर पर अपामार्ग की मिट्टी व पत्तों का लेप लगाकर स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात पूजा स्थल पर वेदी बनाकर कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ—इन सातों ऋषियों तथा देवी अरुंधति का श्रद्धापूर्वक पंचामृत, गंध, अक्षत, धूप, दीप और श्वेत पुष्पों से पूजन करना चाहिए।"

मुनि ने बताया कि इस व्रत में बिना जुते हुए अन्न जैसे समा के चावल (मोरधन) और कंदमूल का ही एक समय सात्विक आहार ग्रहण किया जाता है। उत्तंक मुनि के वचनों का पालन करते हुए कन्या ने श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी के व्रत का अनुष्ठान किया और सप्तऋषियों की आराधना की। व्रत के दिव्य प्रभाव से कन्या के शरीर से समस्त कीड़े नष्ट हो गए, उसका शरीर कुंदन की भांति कांतिमान हो गया और वह समस्त शारीरिक व मानसिक पापों से मुक्त होकर अंत में परम गति को प्राप्त हुई।

ऋषि पंचमी का यह पावन पर्व हमें शुचिता, मर्यादा और प्रकृति के नियमों के प्रति सजग रहने का शाश्वत संदेश देता है। जो भी स्त्री या पुरुष इस दिन सच्चे हृदय से ऋषि पंचमी की कथा सुनते हैं, उन्हें जाने-अनजाने में हुए समस्त दोषों से मुक्ति मिलती है और जीवन में अक्षय सौभाग्य, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।