प्रोड्यूसर्स हाथ में थमा रहे थे ब्लैंक चेक, नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने ठुकराए करोड़ों के ऑफर
हिंदी सिनेमा में अपनी सशक्त अदायगी और जीवंत किरदारों के दम पर खास मुकाम हासिल करने वाले अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी का फिल्मी सफर संघर्ष और आत्मसम्मान की एक मिसाल है। बॉलीवुड में बिना किसी गॉडफादर के वर्षों तक छोटे-मोटे रोल्स और कड़े संघर्ष के बाद जब नवाज को पहचान मिली, तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अभिनेता ने अपने करियर के उस दौर को याद किया जब सफलता उनके कदम चूम रही थी और बड़े-बड़े फिल्म निर्माता उन्हें मनचाही रकम देने के लिए तैयार थे। नवाजुद्दीन ने खुलासा किया कि एक दौर ऐसा भी आया जब प्रोड्यूसर्स उनके हाथ में ब्लैंक चेक (कोरा चेक) थमा रहे थे और उनसे केवल फिल्मों के लिए हां कहने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन उन्होंने उन करोड़ों के प्रलोभनों को साफ ठुकरा दिया था।
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'किक' के बाद बदला पूरा दौर
नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने साझा किया कि जब अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में फैजल खान के किरदार ने सिनेमाघरों में तहलका मचाया, उसके बाद उनकी दुनिया पूरी तरह बदल गई। इसके तुरंत बाद सलमान खान के साथ 'किक' में उनके विलेन के किरदार शिव गजरा और 'बजरंगी भाईजान' के चांद नवाब को दर्शकों का बेइंतहा प्यार मिला।
नवाज ने बताया कि उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में उनके नाम का सिक्का चल पड़ा था। जो निर्माता पहले उन्हें ऑडिशन के लिए हफ्तों इंतजार करवाते थे, वही अब उनके घर के चक्कर काट रहे थे। कई बड़े निर्माताओं ने उनके सामने खाली चेक रखकर कहा कि वे अपनी मर्जी से जितनी रकम चाहें भर लें, बस उनकी फिल्म की तारीखें दे दें और प्रोजेक्ट साइन कर लें।
'मैंने तय किया था कि लालच में आकर अपनी कला का सौदा नहीं करूंगा'
करोड़ों के उन ब्लैंक चेक ऑफर्स को ठुकराने की वजह बताते हुए नवाजुद्दीन ने कहा कि उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों में ही अपने भीतर कुछ कड़े उसूल तय कर लिए थे।
नवाज ने कहा, "जब आपके सामने पैसों का अंबार लगा दिया जाता है, तो कोई भी डगमगा सकता है। लेकिन मैंने खुद से एक वादा किया था कि मैं पैसों या लालच के लिए कभी अपनी कला और अपने किरदारों के साथ समझौता नहीं करूंगा। अगर मुझे किसी फिल्म की स्क्रिप्ट में दम नहीं दिखता था या मेरा किरदार दोहराया हुआ (स्टीरियोटाइप) लगता था, तो मैं सीधे हाथ जोड़ लेता था। मैंने तय किया था कि मैं वही काम करूंगा जो एक अभिनेता के तौर पर मुझे संतुष्टि दे, न कि सिर्फ मेरा बैंक बैलेंस बढ़ाए।"
टाइपकास्ट होने का था सबसे बड़ा डर
नवाजुद्दीन ने आगे बताया कि उस दौर में ज्यादातर निर्माता उन्हें वही पुराने विलेन या गैंगस्टर वाले रोल ही दोबारा करवाना चाहते थे। अगर वे ब्लैंक चेक स्वीकार कर लेते, तो उन्हें एक ही तरह के सांचे में ढाल दिया जाता और उनकी रचनात्मक भूख खत्म हो जाती।
अभिनेता के अनुसार, एक कलाकार के लिए सबसे बड़ा खतरा 'टाइपकास्ट' होना होता है। उन्होंने पैसों के बजाय 'मंटो', 'रमन राघव 2.0' और 'ठाकरे' जैसी चुनौतीपूर्ण और लीक से हटकर कहानियों को चुना, जहां भले ही उन्हें ब्लैंक चेक न मिले हों, लेकिन एक अभिनेता के रूप में उनका रुतबा हमेशा के लिए स्थापित हो गया।
संघर्ष के दिनों ने सिखाया जमीन से जुड़े रहना
नवाजुद्दीन ने अपनी जड़ों को याद करते हुए कहा कि जब किसी इंसान ने लंबा वक्त मुफलिसी और एक-एक वक्त के खाने के लिए संघर्ष करते हुए काटा हो, तो उसे पैसों की अहमियत तो पता होती है, लेकिन पैसे की हवस उस पर हावी नहीं हो पाती।
उन्होंने कहा कि मुंबई में गुजारे गए उन 10-12 वर्षों के कठिन संघर्ष ने उन्हें विनम्र रहना और अपने काम के प्रति ईमानदार रहना सिखाया। आज भी वे किसी स्क्रिप्ट को साइन करने से पहले यह देखते हैं कि वह कहानी समाज या दर्शकों के दिलों को छू पाएगी या नहीं। नवाजुद्दीन के इस बेबाक खुलासे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे बॉलीवुड में महज एक स्टार बनने नहीं, बल्कि एक सच्चे फनकार के रूप में अपनी विरासत छोड़ने आए हैं।