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September 28 2026 07:32 pm

'पिया घर आवेंगे' शादी के लिए नहीं, पिता के देवगमन पर लिखा था; अब विवाह और जयमाला में बजता देख हैरान हैं कैलाश खेर

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भारतीय संगीत जगत में अपनी अनूठी और रूहानी आवाज से श्रोताओं के दिलों को छू लेने वाले पद्मश्री गायक कैलाश खेर ने अपने एक बेहद लोकप्रिय गीत के पीछे की असल कहानी साझा कर सबको हैरान और भावुक कर दिया है। भारतीय शादियों, खासकर जयमाला और दुल्हन की खूबसूरत एंट्री (ब्राइडल एंट्री) के वक्त अक्सर बजने वाला मशहूर गीत 'आज मेरे पिया घर आवेंगे' किसी सांसारिक प्रेम, शादी-ब्याह या दूल्हा-दुल्हन के मिलन के लिए नहीं रचा गया था। कैलाश खेर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि इस गीत के एक-एक शब्द की रचना उन्होंने अपने पूज्य पिता के देवलोक गमन यानी उनके देहावसान के मार्मिक पलों में की थी। उन्होंने कहा कि यह गीत आत्मा और परमात्मा के शाश्वत मिलन और दुनिया से विदाई का प्रतीक है, लेकिन दुनिया इसे सांसारिक शादी-ब्याह में बजाती है।

जब गोद में पिता ने ली अंतिम सांस: ध्यान और हरि ॐ के जाप में बीता आखिरी पल

कैलाश खेर ने अपने पिता के अंतिम क्षणों को याद करते हुए बताया कि उनके पिता एक उच्च कोटि के साधक और अभ्यासी थे, जो रोजाना लंबे समय तक ध्यान (मेडिटेशन) किया करते थे। कैलाश खेर ने बताया कि जिस दिन उनके पिता का देहावसान हुआ, उस दिन ब्रह्म मुहूर्त के समय वे उनकी ही गोद में सिर रखकर लेटे हुए थे। वे बताते हैं कि उनके पिता मेडिटेशन की अवस्था में थे और लगातार 'हरि ॐ, हरि ॐ, हरि ॐ' का जाप कर रहे थे।

शुरुआत में यह जाप बहुत धीमा और शांत था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी आवाज इतनी तेज, ओजस्वी और आनंदमयी हो गई जैसे कोई भक्त परम आनंद में डूबकर बहुत जोर-जोर से ईश्वर का गुणगान कर रहा हो। कैलाश खेर ने जब पिता की उस अवस्था को देखा, तो उनके चेहरे पर मृत्यु का कोई भय या दर्द नहीं था, बल्कि एक असीम शांति, तृप्ति और परमात्मा से एकाकार होने का अद्भुत आनंद था। पिता ने हंसते-मुस्कुराते और प्रभु नाम जपते हुए अपनी अंतिम सांसें कैलाश खेर की गोद में छोड़ दीं। कैलाश खेर के अनुसार, उन्होंने मौत के उस अलौकिक दृश्य में आत्मा का परमात्मा से मिलन देखा था, जिसे उन्होंने अपनी पंक्तियों में ढाला।

'चौक पुराओ माटी रंगाओ': शोक के क्षणों से निकला अमर आध्यात्मिक गीत

कैलाश खेर ने कहा कि पिता के इस महामिलन और परमानंद को देखकर उनके भीतर से यह बोल फूटे—'चौक पुराओ, माटी रंगाओ, आज मेरे पिया घर आवेंगे। खबर सुनाऊं जो, खुशी रे बताऊं जो, आज मेरे पिया घर आवेंगे। एरी सखी मंगल गाओ री, धरती अम्बर सजाओ री, उतरेगी आज मेरे पि की सवारी...।' इस गीत में 'पिया' शब्द किसी लौकिक पति या प्रेमी के लिए नहीं, बल्कि उस परमपिता परमात्मा के लिए उपयोग किया गया था, जिसके घर आत्मा लौटकर जा रही थी।

आत्मा खुद का आध्यात्मिक शृंगार कर रही है, सांसारिक बंधनों और कर्मों से मुक्त होकर अपने परम प्रियतम यानी ईश्वर के स्वागत की तैयारी कर रही है। जहां कबीरदास और मीराबाई की परंपरा में देहत्याग को जीवात्मा और परमात्मा का सबसे बड़ा ब्याह माना गया है, उसी दार्शनिक भाव से यह गीत उपजा था। कैलाश खेर ने बताया कि पिता के अंतिम संस्कार के दिन ही उनका एक लाइव म्यूजिक कॉन्सर्ट भी तय था। सुबह पिता का दाह-संस्कार करने के बाद वे शाम को मंच पर पहुंचे और भारी मन से दर्शकों का मनोरंजन किया।

शादियों और जयमाला में बजता देख हैरान रह जाते हैं कैलाश खेर

कैलाश खेर ने इस बात पर थोड़ा व्यंग्य और आश्चर्य व्यक्त किया कि आज के दौर में लोग गीतों के गहरे भाव और रूह को समझे बिना ही उसे रील्स और शादियों में इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब मेरी टीम मुझे दिखाती है कि दुल्हनें इस गाने पर एंट्री ले रही हैं और दूल्हे-दुल्हन की जयमाला के वक्त यह बज रहा है, तो मुझे लगता है कि संसार को केवल संसारी सुख ही दिखाई देता है। लोग बाहरी चमक-दमक और शब्दों की ऊपरी मिठास तक ही सीमित रह जाते हैं।

कैलाश खेर ने स्पष्ट किया कि सांसारिक प्रेम नश्वर और क्षणभंगुर है, जबकि माता-पिता का रिश्ता और आत्मा का ईश्वर से संबंध ही इस धरती पर सबसे सच्चा और अमर है। उन्होंने कहा कि यह गीत दुनिया से विदा लेने और उस परम सत्ता में विलीन होने का उत्सव है, जिसे लोगों ने अपनी सांसारिक खुशियों का गान बना लिया है।