'केरल में लोग अंग्रेजी जानते हैं, पर बोलना नहीं चाहते': सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की यह टिप्पणी
India News Live,Digital Desk : सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान केरल के भाषाई परिवेश को लेकर एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने माना कि किसी राज्य की साक्षरता या भाषा की जानकारी को अदालती कार्यवाही की सुगमता के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक पति-पत्नी के बीच तलाक और बच्चे की कस्टडी से जुड़ा है। 2017 में शादी के बाद यह जोड़ा 2023 में ब्रिटेन शिफ्ट हो गया था, लेकिन वहां उनके रिश्तों में कड़वाहट आ गई। पति अपने नाबालिग बच्चे को लेकर भारत लौट आया और केरल की फैमिली कोर्ट में केस दायर कर दिया।
विदेश में रह रही पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केस को केरल से पंजाब ट्रांसफर करने की मांग की। पत्नी का तर्क था कि भारत में उसकी बूढ़ी मां इस मुकदमे की पैरवी कर रही हैं और केरल की स्थानीय भाषा (मलयालम) न आने के कारण उन्हें अदालती कार्यवाही को समझने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में बहस और टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पति के वकील ने दलील दी कि "केरल में हर कोई अंग्रेजी जानता और समझता है, यह एक लैंग्वेज-फ्रेंडली राज्य है।" इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने तुरंत टोकते हुए कहा:
"हमें मत सिखाइए, वहां बहुत दिक्कत होती है। केरल में भले ही लोगों को अंग्रेजी आती हो, लेकिन वे तब भी अंग्रेजी में बात करना नहीं चाहते।"
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के अंग्रेजी जानने का अर्थ यह नहीं है कि वह अदालत की औपचारिक और तकनीकी कार्यवाही में उस भाषा का उपयोग करने में सहज महसूस करे।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
पति की तरफ से यह तर्क दिया गया कि पत्नी खुद विदेश में रहती है, इसलिए केस चाहे केरल में चले या पंजाब में, उसे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन बेंच ने पति के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि भाषा की बाधा के कारण पत्नी अपनी बात सही तरीके से अदालत के समक्ष नहीं रख पा रही थी, जो कि बच्चे की कस्टडी जैसे संवेदनशील मामले में न्याय के लिए जरूरी है। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने केस को केरल से लुधियाना (पंजाब) ट्रांसफर करने का आदेश दिया।