रेगिस्तान में टूटा पाकिस्तान का सपना: लोंगेवाला की वह ऐतिहासिक लड़ाई, जिसने 1971 का युद्ध पलट दिया
4 दिसंबर 1971 की रात राजस्थान के रेगिस्तान में लड़ी गई एक भीषण लड़ाई ने भारत-पाक युद्ध की दिशा ही बदल दी। यह वही ऐतिहासिक लोंगेवाला युद्ध था, जिसने साबित कर दिया कि आधुनिक युद्धों में भारतीय वायुसेना केवल सहायक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाती है। आज यह युद्ध एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि 1997 की सुपरहिट फिल्म बॉर्डर के बाद अब बॉर्डर-2 की तैयारी चल रही है, जो 1971 के ही युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित बताई जा रही है।
लेकिन सिनेमा से अलग, लोंगेवाला की असली कहानी कहीं ज्यादा रोमांचक, साहस और रणनीति से भरी हुई है।
पाकिस्तान की बड़ी लेकिन घातक भूल
1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने पश्चिमी मोर्चे पर एक जोखिम भरी योजना बनाई। भारी टैंकों और करीब 2000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना ने जैसलमेर सेक्टर से भारत में घुसपैठ की। मकसद था लोंगेवाला होते हुए रामगढ़ और फिर जैसलमेर पर कब्जा करना, ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके।
स्थानीय इलाकों में यह चर्चा तक होने लगी थी कि पाकिस्तानी टैंक कुछ ही दिनों में जैसलमेर पहुंच जाएंगे। लेकिन यही आत्मविश्वास पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी गलती साबित हुआ।
छोटी चौकी, सीमित हथियार और अडिग हौसला
लोंगेवाला सीमा चौकी पर उस समय 23 पंजाब रेजिमेंट के गिने-चुने जवान तैनात थे। उनके पास न तो टैंक थे और न ही भारी तोपखाना। मशीनगन, मोर्टार और कुछ रॉकेट लॉन्चर ही उनकी ताकत थे।
रात के अंधेरे में जब टैंकों की गड़गड़ाहट सुनाई दी, तब भारतीय जवानों ने हालात की गंभीरता को समझते हुए तुरंत उच्च अधिकारियों को सूचना दी। रेगिस्तानी इलाके में पाकिस्तानी टैंकों की धीमी गति भारत के लिए बड़ा मौका बन गई। इसी दौरान वायुसेना को अलर्ट कर दिया गया।
भारतीय वायुसेना का निर्णायक प्रहार
रात में उड़ान की सीमाओं के कारण वायुसेना तुरंत हमला नहीं कर सकी, लेकिन सुबह होते ही जैसलमेर एयरबेस से भारतीय हंटर लड़ाकू विमान आसमान में गरजने लगे।
खुले रेगिस्तान में बिना किसी हवाई सुरक्षा के पाकिस्तानी टैंक आसान निशाना बन गए। भारतीय पायलटों ने बेहद कम ऊंचाई से उड़ान भरते हुए रॉकेट और तोपों से सटीक हमले किए। देखते ही देखते कई टैंक जलते मलबे में तब्दील हो गए।
धूल, धुएं और इंजन ओवरहीटिंग के कारण पाकिस्तानी टैंकों की हालत बदतर होती चली गई। कई टैंक रास्ते में ही बंद हो गए और चालक दल को उन्हें छोड़कर भागना पड़ा।
युद्ध का रुख बदला, इतिहास रच गया
दोपहर तक हालात पूरी तरह भारत के पक्ष में आ चुके थे। बड़ी संख्या में पाकिस्तानी टैंक नष्ट या छोड़े जा चुके थे। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, दूसरे विश्व युद्ध के बाद किसी एक लड़ाई में टैंकों का इतना बड़ा नुकसान बेहद दुर्लभ है।
इस हार ने पाकिस्तान की आक्रामक रणनीति तोड़ दी। पश्चिमी मोर्चे पर मिली इस सफलता से भारत को पूर्वी मोर्चे पर पूरी ताकत झोंकने का मौका मिला, जिसका परिणाम अंततः बांग्लादेश के गठन के रूप में सामने आया।
लोंगेवाला की लड़ाई सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि यह भारतीय साहस, सूझबूझ और वायुसेना की ताकत का जीवंत उदाहरण बन गई।