चीन के प्रति मोदी सरकार की नीति '4C' वाली! ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर केंद्र पर क्यों भड़की कांग्रेस
India News Live,Digital Desk : भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद और व्यापारिक घाटे को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने चीन के प्रति केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे "4C नीति" करार दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बुधवार (20 मई) को बीजिंग के प्रति सरकार के रुख को आड़े हाथों लिया।
कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार चीन के सामने लगातार, नपी-तुली हार मानने की '4C नीति' यानी "Continuing, Calibrated Capitulation to China" (चीन के प्रति निरंतर और सुनियोजित समर्पण) की राह पर चल रही है। इसके साथ ही कांग्रेस ने विवादों में घिरे 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' को लेकर भी सरकार को घेरा है और इसे क्रोनी कैपिटलिज्म (मित्र पूंजीवाद) का हिस्सा बताया है।
क्या है मोदी सरकार की '4C' नीति? कांग्रेस ने गिनाईं कमियां
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पहले ट्विटर) पर एक लंबा पोस्ट साझा करते हुए केंद्र सरकार की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि सरकार चीन के सामने पूरी तरह सरेंडर कर चुकी है। रमेश ने अपनी बात को साबित करने के लिए तीन प्रमुख बिंदु सामने रखे:
शहीदों का अपमान और क्लीन चिट: जयराम रमेश के मुताबिक, 19 जून 2020 को गलवान घाटी हिंसक झड़प के बाद प्रधानमंत्री द्वारा चीन को दी गई "अस्पष्ट क्लीन चिट" लद्दाख में शहीद हुए हमारे 20 जवानों का सीधा अपमान थी।
गश्त के अधिकार गंवाए: कांग्रेस ने दावा किया कि चीन के साथ हुई सैन्य वार्ताओं में मोदी सरकार ने लद्दाख के कई रणनीतिक इलाकों में भारतीय सेना के पारंपरिक गश्त (Patrolling) करने और स्थानीय चरवाहों के पशुओं को चराने के अधिकार छोड़ दिए हैं।
रिकॉर्ड तोड़ व्यापार घाटा: उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर घेरते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की निगरानी में ही साल 2025-26 के दौरान भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर लगभग 115 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसका सबसे घातक असर भारतीय घरेलू उद्योगों, खासकर MSME सेक्टर पर पड़ रहा है।
इसके अलावा, कांग्रेस नेता ने याद दिलाया कि मई 2025 में हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान की सैन्य प्रतिक्रिया की योजना बनाने और उसकी निगरानी करने में चीन की निर्णायक भूमिका थी। इस पर देश के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के खुलासों के बावजूद प्रधानमंत्री ने आज तक चुप्पी नहीं तोड़ी है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: सामरिक जरूरत या 'मोदानी' का बिजनेस?
जयराम रमेश ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अपनी इन तमाम विफलताओं को छिपाने के लिए एक दुष्प्रचार अभियान चला रही है। उन्होंने कहा कि जो लोग भी ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (Great Nicobar Project) के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को लेकर आवाज उठा रहे हैं, सरकार के तंत्र द्वारा उन्हें "चीन के प्रति नरम" (Soft on China) साबित करने की कोशिश की जा रही है, जो कि सरासर पाखंड है।
पूर्व पर्यावरण मंत्री ने इस मेगा प्रोजेक्ट की रणनीतिक आवश्यकता पर भी बड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने साफ कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना विशुद्ध रूप से एक व्यावसायिक प्रोजेक्ट है। इसका जो मुख्य हिस्सा यानी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (Transshipment Port) है, उसमें सैन्य अवसंरचना या देश की सुरक्षा का कोई तत्व शामिल ही नहीं है।
"बुलडोजर चलाकर आगे बढ़ाई जा रही परियोजना"
जयराम रमेश ने सीधे प्रधानमंत्री पर हमला बोलते हुए कहा, "हकीकत यह है कि चीन की रणनीतिक चुनौती का मुकाबला करने के लिए हमारे पास 'INS बाज़' (INS Baaz) और अंडमान-निकोबार कमांड के अन्य सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। वहां बुनियादी ढांचे के विस्तार के सुझाव लंबे समय से लंबित हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। इसके विपरीत, जिस ग्रेट निकोबार परियोजना को प्रधानमंत्री बुलडोजर चलाकर आगे बढ़ा रहे हैं, उसके 'मोदानी' (मोदी-अडानी) कारोबारी साम्राज्य का हिस्सा बनने की पूरी संभावना है।"
कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि इस प्रोजेक्ट के व्यावसायिक फायदे चाहे जो भी हों, लेकिन पर्यावरण, घने जंगलों, समुद्री जीव-जंतुओं और वहां की स्थानीय जनजातियों पर इसका बेहद विनाशकारी और मानवीय स्तर पर अपूरणीय असर पड़ेगा।