कोलाथुर में 100% VVPAT पर्ची गिनवाने की मांग पर अड़े थे एमके स्टालिन, मद्रास हाईकोर्ट ने दिया तगड़ा झटका
तमिलनाडु की सियासत में विधानसभा चुनावों के ऐतिहासिक नतीजों के बाद उपजा कानूनी और चुनावी संग्राम अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। कोलाथुर विधानसभा सीट पर अपनी अप्रत्याशित चुनावी हार को चुनौती देते हुए सभी 100 प्रतिशत वीवीपैट (VVPAT) पर्चियों की दोबारा गिनती कराने और प्रतिद्वंद्वी की जीत को शून्य घोषित कराने की द्रमुक (DMK) प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की उम्मीदों पर मद्रास हाईकोर्ट ने पूरी तरह पानी फेर दिया है। मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्टालिन द्वारा दायर रिट याचिका को कानूनी रूप से 'सुनवाई योग्य नहीं' (Not Maintainable) करार देते हुए सिरे से खारिज कर दिया। इस ऐतिहासिक अदालती फैसले ने न केवल नवगठित पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) के नवनिर्वाचित विधायक वी.एस. बाबू की विधायकी पर मंडरा रहे खतरे को हमेशा के लिए टाल दिया है, बल्कि अपने सियासी डेब्यू में ही दक्षिण भारतीय राजनीति में तहलका मचाने वाले अभिनेता व टीवीके प्रमुख थलापति विजय के राजनीतिक खेमे को एक बहुत बड़ी नैतिक और विधिक विजय दिलाई है।
कोलाथुर सीट का सियासी दंगल: जब 8,795 वोटों से लड़खड़ाया स्टालिन का अजेय किला
यह पूरा कानूनी विवाद तमिलनाडु की उस सबसे हाई-प्रोफाइल कोलाथुर विधानसभा सीट से जुड़ा है, जिसे बीते डेढ़ दशक से एम.के. स्टालिन का अभेद्य राजनीतिक गढ़ माना जाता था। स्टालिन यहां से लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीतकर सदन पहुंचे थे और इसी सीट के प्रतिनिधित्व के दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया था।
विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को उस वक्त चौंका दिया, जब अभिनेता थलापति विजय की नवगठित पार्टी टीवीके के उम्मीदवार वी.एस. बाबू ने स्टालिन को सीधे मुकाबले में पटखनी दे दी। चुनाव आयोग द्वारा घोषित आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, टीवीके उम्मीदवार वी.एस. बाबू को कुल 82,997 वोट हासिल हुए, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के खाते में 74,202 मत ही आ सके। महज 8,795 वोटों के अंतर से अपने ही घरेलू मैदान पर मिली इस अप्रत्याशित हार को डीएमके नेतृत्व पचा नहीं पाया। नतीजों के तुरंत बाद से ही ईवीएम और वीवीपैट की कार्यप्रणाली पर संदेह जताते हुए द्रमुक ने मोर्चा खोल दिया था, जो अंततः चेन्नई में मद्रास हाईकोर्ट की चौखट तक जा पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला: कपिल सिब्बल की वो दलीलें जो अदालत में नहीं टिक सकीं
मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ के समक्ष इस मामले की पैरवी के लिए देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल मैदान में उतरे। सिब्बल ने अदालत के सामने अपनी दलीलें रखते हुए अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले की दुहाई दी।
वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार चुनाव में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहने वाले किसी भी उम्मीदवार को परिणाम की घोषणा के सात दिनों के भीतर 5 प्रतिशत ईवीएम के बर्न मेमोरी और माइक्रोकंट्रोलर की तकनीकी जांच कराने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। सिब्बल ने कहा कि स्टालिन ने परिणाम आने के महज तीन दिन बाद, यानी 7 मई को ही चुनाव आयोग को सत्यापन के लिए विधिवत आवेदन सौंप दिया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि चुनाव आयोग ने इस अनिवार्य प्रक्रिया में जानबूझकर 45 दिनों से अधिक का अप्रत्याशित विलंब किया और सत्यापन की प्रक्रिया 29 जुलाई से शुरू करके 5 अगस्त को पूरी की। सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग की इस अत्यधिक देरी के कारण सामान्य चुनावी याचिका (Election Petition) दाखिल करने की 45 दिनों की वैधानिक समयसीमा समाप्त हो गई, इसलिए पीड़ित उम्मीदवार को बिना किसी कानूनी उपचार के बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता।
ईवीएम में खराबी और चेन-ऑफ-कस्टडी के गंभीर आरोप: स्टालिन के हलफनामे का ब्योरा
हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में एम.के. स्टालिन ने कोलाथुर विधानसभा क्षेत्र के सभी 286 मतदान केंद्रों की ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की 100 प्रतिशत पर्चियों की भौतिक गिनती कराने की मांग की थी। याचिका में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग द्वारा 14 ईवीएम मशीनों के किए गए शुरुआती सत्यापन के दौरान बेहद चौंकाने वाली तकनीकी विसंगतियां और प्रशासनिक लापरवाही सामने आई थीं।
याचिका के अनुसार, मतदान केंद्र संख्या 28 और 75 पर वीवीपैट मशीनें सत्यापन शुरू होते ही तकनीकी रूप से ठप हो गईं, जिससे यह साबित होता है कि मशीनों में गंभीर आंतरिक खामियां थीं। सबसे सनसनीखेज आरोप मतदान केंद्र संख्या 208 को लेकर लगाया गया, जहां याचिकाकर्ता के मुताबिक कंट्रोल यूनिट (CU) ने उस बैलेट यूनिट को पहचानने से ही इनकार कर दिया जिस पर एम.के. स्टालिन का नाम और चुनाव चिह्न दर्ज था। इसके अलावा मतदान केंद्र संख्या 79 और 157 पर ईवीएम के कैरिंग केस पर खाली एड्रेस टैग मिलने और सील उल्टी तरफ लगे होने का हवाला देते हुए 'चेन-ऑफ-कस्टडी' के प्रोटोकॉल टूटने का आरोप लगाया गया। स्टालिन का कहना था कि इन गंभीर खामियों के बावजूद जिला निर्वाचन अधिकारी ने प्रक्रिया को क्लीन चिट दे दी, इसलिए रिट याचिका के जरिए बाबू के निर्वाचन को रद्द कर स्टालिन को विजेता घोषित किया जाए।
चुनाव आयोग का संवैधानिक प्रतिवाद: अनुच्छेद 329(b) और 'पैंडोरा बॉक्स' की चेतावनी
चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू और जी. राजगोपालन ने स्टालिन की याचिका की वैधता पर प्रारंभिक आपत्ति दर्ज करते हुए इसे संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ बताया। आयोग के वकीलों ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 326 और 329(b) तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 80 बहुत स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित करती है कि देश के किसी भी संसदीय या विधानसभा चुनाव के परिणाम को केवल और केवल 'चुनाव याचिका' (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है, किसी रिट याचिका (Writ Petition) के जरिए नहीं।
निर्वाचन आयोग ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने बेहद 'चालाकी और शिल्पकारी' के साथ ड्राफ्टिंग करके सीधे किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की जीत को शून्य कराने और खुद को विधायक घोषित कराने की मांग अनुच्छेद 226 के तहत कर दी है। आयोग ने बेंच को आगाह किया कि यदि किसी पराजित उम्मीदवार को रिट याचिका के रास्ते चुनाव रद्द कराने की छूट दे दी गई, तो यह देश की संपूर्ण चुनावी और न्यायिक व्यवस्था के लिए एक ऐसा 'पैंडोरा बॉक्स' (विवादों का पिटारा) खोल देगा जिससे हर हारा हुआ प्रत्याशी अदालतों में रिट दाखिल करने लगेगा। आयोग ने यह भी कहा कि ईवीएम सत्यापन का सुप्रीम कोर्ट का निर्देश केवल एक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय था, न कि नियमित चुनाव याचिका के विकल्प के रूप में कोई समानांतर व्यवस्था।
मद्रास हाईकोर्ट का दो टूक फैसला: रिट याचिका के जरिए चुनाव रद्द करने की मांग अवैध
मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की मैराथन सुनवाई के बाद सुरक्षित रखे गए फैसले को सुनाते हुए स्टालिन की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि चाहे याचिका की भाषा कितनी भी आकर्षक क्यों न बनाई गई हो, इसके जरिए मांगी गई राहत का मूल स्वरूप चुनाव परिणाम को चुनौती देना ही है, जो संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत पूरी तरह वर्जित है।
पीठ ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि यदि सत्यापन प्रक्रिया में सामने आई विसंगतियों को रिट याचिका का आधार मानकर किसी निर्वाचित विधायक को पद से हटाने और उपविजेता को विजयी घोषित करने की अनुमति दी जाएगी, तो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत निर्धारित चुनावी याचिका का पूरा वैधानिक ढांचा ही निरर्थक हो जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) किसी भी सूरत में अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के असाधारण अधिकार क्षेत्र का विस्तार नहीं करती। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि 45 दिनों की समयसीमा और देरी से जुड़े कोई भी तर्क केवल सक्षम चुनाव ट्रिब्यूनल के समक्ष इलेक्शन पिटीशन में साक्ष्य के रूप में रखे जा सकते हैं, न कि सीधे रिट कोर्ट के जरिए।
थलापति विजय और टीवीके खेमे में जश्न: तमिल राजनीति में नए शक्ति केंद्र की पुष्टि
मद्रास हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले के बाद तमिलनाडु की राजनीति का पारा अचानक चढ़ गया है। अभिनेता थलापति विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' के कार्यकर्ताओं ने चेन्नई से लेकर मदुरै और तिरुचिरापल्ली तक सड़कों पर उतरकर आतिशबाजी की और मिठाइयां बांटीं। टीवीके के नवनिर्वाचित विधायक वी.एस. बाबू ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सत्य और जनता के जनादेश की जीत हुई है। उन्होंने कहा कि कोलाथुर की जनता ने पूर्ववर्ती सरकार के अहंकार और जमीनी स्तर पर जनता से कटे रहने की राजनीति को हराकर बदलाव के लिए वोट दिया था, जिसे कानूनी दांव-पेचों से छीनने की कोशिश नाकाम हो गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला थलापति विजय की पार्टी के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। पहली बार चुनावी समर में उतरकर सीधे राज्य के मुख्यमंत्री को उनके ही गढ़ में मात देना कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। अब उच्च न्यायालय से उस जीत पर विधिक मुहर लग जाने से टीवीके के कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है। वहीं दूसरी ओर, दशकों तक तमिलनाडु की सत्ता की धुरी रहे डीएमके और एम.के. स्टालिन के लिए यह दोहरा झटका है—पहले जनादेश के मोर्चे पर पराजय और अब अदालत के गलियारे में याचिका का औंधे मुंह गिरना। कानूनी जानकारों का कहना है कि स्टालिन के पास अब सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने का ही एकमात्र कानूनी विकल्प शेष बचा है, लेकिन हाईकोर्ट के कड़े संवैधानिक रुख के बाद वहां भी उनकी राह आसान नजर नहीं आती।