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July 28 2026 02:42 am

Jyeshtha Purnima 2026: आज ज्येष्ठ पूर्णिमा पर दुर्लभ महासंयोग, एक कथा से दूर होंगे जीवन के सारे संकट

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सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का एक विशिष्ट और बेहद पवित्र स्थान है। आज, यानी 2026 की ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन एक अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी महासंयोग बन रहा है। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर ही वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत भी रखा जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, आज के दिन पवित्र नदियों में स्नान, सामर्थ्य अनुसार दान और लक्ष्मी-नारायण की संयुक्त पूजा करने से जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। यदि आप भी आज का व्रत रख रहे हैं, तो सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस चमत्कारी व्रत कथा को पढ़ना या सुनना बिल्कुल न भूलें।

सौभाग्य और मोक्ष का अनूठा संगम

आज के दिन का महत्व दोगुना हो जाता है क्योंकि एक तरफ जहां सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए वट सावित्री का कठिन व्रत रख रही हैं, वहीं दूसरी ओर श्रद्धालु जीवन में सुख-शांति और मोक्ष की कामना से भगवान सत्यनारायण (विष्णु जी) का विधि-विधान से पूजन कर रहे हैं। मान्यता है कि आज के दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य और दान-पुण्य कभी निष्फल नहीं होता।

जब सती सावित्री के आगे झुके यमराज

पौराणिक काल की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की एक अत्यंत गुणवान और तेजस्वी पुत्री थी, जिनका नाम सावित्री था। सावित्री ने अपने वर के रूप में राजा द्युमत्सेन के सदाचारी पुत्र सत्यवान को चुना। विवाह से पूर्व देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को एक अप्रिय सत्य से अवगत कराया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। पिता के लाख समझाने के बाद भी सावित्री अपने धर्म से डिगी नहीं और सत्यवान से विवाह कर लिया। वे अपने दृष्टिहीन सास-ससुर और पति के साथ तपोवन में रहकर सेवा करने लगीं।

वट वृक्ष के नीचे यमराज से सीधी टक्कर

समय का चक्र घूमता रहा और अंततः वह दिन आ ही गया जो सत्यवान का अंतिम दिन नियत था। सत्यवान जब जंगल में लकड़ी काटने गए, तो अचानक उनके सिर में असहनीय दर्द हुआ। वे व्याकुल होकर वट वृक्ष (बरगद के पेड़) के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। देखते ही देखते वहां सत्यवान के प्राण हरने के लिए स्वयं मृत्यु के देवता यमराज प्रकट हुए। यमराज जैसे ही सत्यवान के सूक्ष्म प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करने लगे, सती सावित्री भी निर्भय होकर उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

बुद्धिमत्ता से जीता यमराज का दिल

यमराज ने सावित्री को बार-बार वापस लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पातिव्रत धर्म, अडिग निष्ठा और मधुर वचनों से यमराज को निरुत्तर कर दिया। सावित्री की चतुरता और समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले वरदान में अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राजपाठ वापस मांगा। दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का आशीष मांगा। तीसरे वरदान के रूप में सावित्री ने स्वयं के लिए सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया।

जैसे ही यमराज ने 'तथास्तु' कहा, वे अपनी ही बात के जाल में बंध गए। वे समझ गए कि पतिव्रता सावित्री के पति के बिना उनका यह वरदान पूरा होना असंभव है। सावित्री के इस चातुर्य से बेहद प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को सहर्ष मुक्त कर दिया।

अखंड सौभाग्य और श्री हरि की असीम कृपा

सावित्री तत्काल उसी वट वृक्ष के पास लौट आईं जहां उनके पति का निष्प्राण शरीर रखा था। उन्होंने जैसे ही वट वृक्ष की परिक्रमा की, सत्यवान के शरीर में चेतना लौट आई और वे जीवित हो उठे। यही कारण है कि आज के दिन वट वृक्ष की पूजा, परिक्रमा और भगवान विष्णु संग माता लक्ष्मी की कथा सुनने का विधान है। ऐसा करने से कुंडली के सभी अशुभ दोषों का प्रभाव समाप्त हो जाता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।