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September 12 2026 04:10 pm

अमेरिकी सैनिकों पर जानलेवा हमले में ईरान की मदद कर रहा चीन? सैटेलाइट तस्वीरों के खुलासे से भड़का अमेरिका

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पश्चिम एशिया के रणक्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हो रहे जानलेवा हमलों को लेकर एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज अंतरराष्ट्रीय खुलासा सामने आया है। अमेरिका की शीर्ष खुफिया एजेंसियों और रक्षा अधिकारियों के अनुसार, ईरान द्वारा अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ठिकानों पर किए जा रहे मिसाइल व ड्रोन हमलों में चीन की भूमिका को लेकर पुख्ता तकनीकी सबूत हाथ लगे हैं। 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' की ताजा रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया है कि जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए घातक बैलिस्टिक मिसाइल हमले से ठीक पहले और बाद में चीनी संस्थाओं (Chinese Entities) ने ईरान को उस बेस की हाई-रेजोल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें और सटीक खुफिया डेटा उपलब्ध कराया था। इस हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की जान चली गई थी। इस खुलासे के बाद वाशिंगटन में हड़कंप मच गया है और यह सवाल पूरी दुनिया में गूंज रहा है कि क्या चीन परदे के पीछे से ईरान की सैन्य मदद कर अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनवा रहा है?

जॉर्डन बेस पर घातक हमला: चीनी सैटेलाइट इमेजरी से कैसे जुड़ा कनेक्शन?

यह पूरा विवाद जॉर्डन के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित अमेरिकी वायुसेना के रणनीतिक मुवाफ्फाक साल्ती एयर बेस (Muwaffaq Salti Air Base) पर हुए भीषण हमले से जुड़ा है। 17 जुलाई को ईरान द्वारा दागी गई सटीक बैलिस्टिक मिसाइलों ने सीधे एयरबेस के रिहायशी क्षेत्र (हाउसिंग क्वार्टर्स) और एयरक्राफ्ट हैंगर्स को निशाना बनाया था, जिसमें तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

अमेरिकी तकनीकी जांच में पाया गया कि अमेरिकी सेना द्वारा पहले किए गए जवाबी हमलों में ईरान के अपने प्राथमिक सैन्य रडार, निगरानी उपग्रह और सर्विलांस सिस्टम बुरी तरह तबाह हो चुके थे, जिससे ईरान की दूरदराज के लक्ष्यों की रियल-टाइम निगरानी करने की क्षमता सीमित हो गई थी। ऐसे में सवाल उठा कि ईरान ने सैकड़ों मील दूर स्थित इस बेस के सबसे संवेदनशील हिस्सों पर इतनी सटीक पिन-पॉइंट स्ट्राइक कैसे की? अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल फॉरेंसिक जांच में यह बात स्पष्ट हुई कि चीनी वाणिज्यिक व तकनीकी कंपनियों ने हमले से ठीक पहले बेस की विस्तृत इमेजरी ईरान को बेची या साझा की, जिससे टारगेट लॉक किया गया, और हमले के तीन दिन के भीतर नुकसान का आकलन (बैटल डैमेज असेसमेंट) करने के लिए भी चीनी सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल हुआ।

अमेरिका को चीन पर क्यों गहरा रहा है संदेह? ये हैं 4 बड़े कारण

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) और विदेश विभाग की चिंताओं के पीछे केवल एक हमला नहीं, बल्कि सिलसिलेवार तकनीकी व कूटनीतिक कड़ियां हैं:

सैटेलाइट कंपनियों पर पहले से प्रतिबंध: अमेरिका ने मई के महीने में ही तीन प्रमुख चीनी सैटेलाइट फर्मों—मिजार्ट विजन (Mizart Vision), अर्थ आई (Earth Eye) और चांग गुआंग (Chang Guang) पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। इन कंपनियों पर आरोप था कि वे ईरान और यमन के हूती विद्रोहियों को ऐसी सैटेलाइट इमेजरी मुहैया करा रही थीं, जिसका सीधा इस्तेमाल लाल सागर में अमेरिकी युद्धपोतों और नौसैनिक संपत्तियों को ट्रैक करने में किया गया।

सीक्रेट जासूसी उपग्रह सौदा: अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने बीजिंग के अत्याधुनिक टीईई-01बी (TEE-01B) स्पाई सैटेलाइट तक पहुंच हासिल करने के लिए करोड़ों डॉलर का गुप्त करार किया था, जिससे उसे पूरे मिडिल ईस्ट के अमेरिकी ठिकानों का डेटा मिलता है।

ड्रोन और मिसाइल कंपोनेंट्स की तस्करी: पेंटागन के अनुसार, ईरान के मशहूर शाहेद ड्रोन्स और बैलिस्टिक मिसाइलों के मलबे की जांच में लगातार मेड-इन-चाइना माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, नेविगेशन चिप्स और ऑप्टिकल सेंसर्स पाए गए हैं, जो प्रतिबंधों के बावजूद चीनी नेटवर्क के जरिए तेहरान तक पहुंचते हैं।

अमेरिकी युद्धपोतों की ट्रैकिंग: हाल के दिनों में जब ईरान ने लाल सागर और ओमान की खाड़ी में तैनात अमेरिकी विमानवाहक पोतों (Aircraft Carriers) की ओर मिसाइलें दागीं, तो अमेरिकी नौसेना ने पाया कि जहाजों की लोकेशन का सटीक रीयल-टाइम डेटा चीनी मैरीटाइम सर्विलांस नेटवर्क से लीक हुआ हो सकता है।

बीजिंग ने नकारे आरोप, कहा- 'अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत है सहयोग'

अमेरिकी राजनयिकों ने इस संवेदनशील मामले को लेकर बीजिंग में अपने चीनी समकक्षों के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। हालांकि, चीनी विदेश मंत्रालय और वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

चीन का कहना है कि वह किसी भी युद्ध में पक्षकार नहीं है और उसके ऊपर लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह 'दुर्भावनापूर्ण और आधारहीन' हैं। चीनी दूतावास के प्रवक्ता के अनुसार, चीन और ईरान के बीच का सहयोग सामान्य अंतरराष्ट्रीय कानूनों और व्यापारिक नियमों के दायरे में है। चीन ने अमेरिकी अधिकारियों से इन दावों के ठोस सार्वजनिक सबूत पेश करने की मांग की है और आरोप लगाया है कि कुछ ताकतें जानबूझकर चीन को क्षेत्रीय संघर्ष में घसीटने का प्रयास कर रही हैं।

24 सितंबर को ट्रंप-शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले गहराया कूटनीतिक संकट

यह सनसनीखेज रिपोर्ट एक ऐसे नाजुक मोड़ पर सार्वजनिक हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में एक अहम द्विपक्षीय शिखर वार्ता (Summit) प्रस्तावित है। इस बैठक से ठीक पहले अमेरिकी सैनिकों की शहादत से चीन का नाम जुड़ने से दोनों महाशक्तियों के बीच अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गई है।

अमेरिकी संसद (कांग्रेस) और सीनेट की खुफिया समितियों ने बाइडन-ट्रंप प्रशासनिक अधिकारियों से इस पूरे मामले पर बंद कमरे में ब्रीफिंग ली है और मांग की जा रही है कि चीन की उन सभी संस्थाओं पर तत्काल वैश्विक प्रतिबंध लगाए जाएं जो छद्म रूप से अमेरिकी सैनिकों के खून से अपने हाथ रंग रही हैं। विदेश मंत्री मार्को रुबियो और व्हाइट हाउस के अधिकारी फिलहाल सार्वजनिक बयानों में तनाव को थामने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी रक्षा हलकों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि बीजिंग का 'दोहरा खेल' अब सीधे तौर पर अमेरिकी सैनिकों के जीवन के लिए घातक साबित हो रहा है।