भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की आहट, फ्लिपकार्ट IPO को मिल सकती है बड़ी राहत

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India News Live,Digital Desk : भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बड़ी प्रगति के संकेत मिल रहे हैं। माना जा रहा है कि अब कुछ ही दिनों या हफ्तों में दोनों देश कारोबारी समझौते के अंतिम मसौदे पर सहमति बनाकर इसकी औपचारिक घोषणा कर सकते हैं। हालिया घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि टैरिफ को लेकर मतभेदों के बावजूद दोनों देश एक-दूसरे के आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इसी कड़ी में अमेरिकी रिटेल दिग्गज वॉलमार्ट की बहुलांश हिस्सेदारी वाली भारतीय ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट के आईपीओ की राह आसान होने के संकेत मिले हैं। फ्लिपकार्ट में चीनी वित्तीय कंपनी टेनसेंट की करीब 5 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिसके चलते कंपनी को प्रेस नोट-3 (PN-3) के तहत गृह मंत्रालय की मंजूरी लेना अनिवार्य है। अब इस मंजूरी के मिलने की संभावना जताई जा रही है।

फ्लिपकार्ट को भारत में मुख्यालय शिफ्ट करने की मंजूरी

हाल ही में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने फ्लिपकार्ट को अपना मुख्यालय सिंगापुर से भारत स्थानांतरित करने की अनुमति दे दी है। फ्लिपकार्ट वॉलमार्ट समूह की कंपनी है। वॉलमार्ट ने वर्ष 2018 में रणनीतिक बदलाव करते हुए सीधे भारतीय बाजार में उतरने के बजाय बेंगलुरु स्थित फ्लिपकार्ट का अधिग्रहण किया था।

अमेरिकी सरकार पहले कई बार भारत की ई-कॉमर्स नीति को लेकर असंतोष जता चुकी है। भारत की सख्त नियामक व्यवस्था को देखते हुए वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट को पूरी तरह भारतीय कानूनों के दायरे में लाने का फैसला किया है। इसी रणनीति के तहत फ्लिपकार्ट को वर्ष 2026 में भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की योजना बनाई गई है।

भारत-अमेरिका बातचीत में ई-कॉमर्स नीति पर चर्चा

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता में ई-कॉमर्स नीति एक अहम मुद्दा रही है। भारत अभी भी अपने ई-कॉमर्स बाजार को पूरी तरह विदेशी कंपनियों के लिए खोलने को तैयार नहीं है, लेकिन वॉलमार्ट समर्थित फ्लिपकार्ट को आईपीओ के लिए सहयोग देने के पक्ष में है।

चीनी कंपनी टेनसेंट की सीमित हिस्सेदारी को फिलहाल बड़ी बाधा नहीं माना जा रहा। इससे भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह अमेरिकी कंपनियों की चिंताओं को गंभीरता से ले रहा है। यदि PN-3 की मंजूरी मिल जाती है, तो फ्लिपकार्ट के लिए भारतीय शेयर बाजार में उतरने का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा।

‘शांति बिल’ से खुलेगा अमेरिकी निवेश का रास्ता

इसी बीच केंद्र सरकार ने संसद में ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025’ यानी शांति बिल पेश किया है। इस विधेयक के जरिए परमाणु दुर्घटनाओं में आपूर्तिकर्ताओं की देयता सीमित करने और निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा उत्पादन की अनुमति देने का प्रस्ताव है।

यह बिल अमेरिकी कंपनियों जैसे वेस्टिंगहाउस और जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के लिए लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को दूर कर सकता है। इससे अमेरिका से परमाणु रिएक्टरों के आयात और निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

ऊर्जा और रक्षा सौदों से भी मजबूत हो रहे रिश्ते

इसके अलावा भारत की सरकारी तेल कंपनियों द्वारा अमेरिका से एलपीजी आयात बढ़ाने के प्रस्ताव को भी अमेरिकी प्रशासन से मंजूरी मिल चुकी है। भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का करीब 10 प्रतिशत अमेरिका से आयात करेगा, जिसे आगे और बढ़ाया जा सकता है।

हाल ही में अमेरिका ने भारत को जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल और एक्सकैलिबर प्रिसिजन आर्टिलरी प्रोजेक्टाइल सहित लगभग 93 मिलियन डॉलर के रक्षा उपकरणों की बिक्री को भी मंजूरी दी है। इन सभी कदमों को भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा में बढ़ते भरोसे के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।