डॉलर को दरकिनार कर रूस से तेल खरीद रहा भारत! बाइडेन की बढ़ी टेंशन, इन विदेशी मुद्राओं में हो रहा है अरबों का भुगतान

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India News Live,Digital Desk : मध्य पूर्व में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने पूरी दुनिया के सामने ऊर्जा का संकट खड़ा कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए एक बड़ा और साहसिक कदम उठाया है। ब्लूमबर्ग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियां अब रूसी कच्चे तेल की खरीद के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल बंद कर रही हैं। भारत ने अब अपनी निर्भरता अमेरिकी मुद्रा से हटाकर अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं पर डाल दी है।

यूएई दिरहम और चीनी युआन में हो रहा है लेनदेन

अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए रूसी तेल के भुगतान के लिए एक नया रास्ता निकाला है। भारतीय तेल कंपनियां अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की मुद्रा दिरहम और चीन की मुद्रा युआन में भुगतान कर रही हैं। इसके अलावा, कुछ विशेष सौदों के लिए सिंगापुर डॉलर और हांगकांग डॉलर के इस्तेमाल पर भी विचार किया जा रहा है। यह कदम न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को डॉलर के उतार-चढ़ाव से बचाएगा, बल्कि भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत की स्वतंत्र नीति को भी दर्शाता है।

ऑफशोर खातों के जरिए कूटनीतिक चाल

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल की खरीद के लिए विशेष ऑफशोर खातों (Offshore Accounts) का उपयोग कर रही हैं। इन खातों के माध्यम से भुगतान को डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में परिवर्तित किया जा रहा है। इंडियन ऑयल और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी दिग्गज कंपनियों ने इस महीने अमेरिका द्वारा दी गई विशेष छूट के बाद रूस से लगभग 6 करोड़ बैरल कच्चे तेल की खरीद की है। यह रणनीति भारत को युद्ध के कारण बाधित हुई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के बावजूद सस्ता तेल सुनिश्चित करने में मदद कर रही है।

आसमान छूती तेल की कीमतें: $100 के पार पहुंचा ब्रेंट

ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने तेल बाजार में आग लगा दी है। गुरुवार को तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 1.56% बढ़कर 103.81 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 91.76 डॉलर के स्तर को छू गया। युद्ध की अनिश्चितता के कारण कीमतों में और भी इजाफा होने की आशंका जताई जा रही है, यही कारण है कि भारत ने रूस के साथ अपनी 'डॉलर-मुक्त' तेल नीति को और तेज कर दिया है।

अमेरिका के लिए बढ़ी चिंता

भारत का यह कदम वाशिंगटन के लिए चिंता का विषय बन सकता है, क्योंकि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। अमेरिकी नीतियों और डॉलर पर निर्भरता कम करने के भारत के इस प्रयास को 'डी-डॉलराइजेशन' की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।