ट्रेन लेट होने से छूटी फ्लाइट तो रेलवे को देना पड़ा 1.3 लाख का हर्जाना, उपभोक्ता अदालत ने ठुकराई 'नो गारंटी' वाली दलील

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India News Live,Digital Desk : भारतीय रेलवे अक्सर परिचालन कारणों (Operational reasons) का हवाला देकर ट्रेनों की देरी को सामान्य प्रक्रिया बताता है, लेकिन ओडिशा की एक उपभोक्ता अदालत ने यात्री के हक में बड़ा फैसला सुनाते हुए रेलवे की लापरवाही पर कड़ा दंड लगाया है। ट्रेन 7 घंटे लेट होने की वजह से फ्लाइट मिस करने वाले एक यात्री को रेलवे को 1.3 लाख रुपये का भारी-भरकम हर्जाना देना पड़ा है।

क्या है पूरा मामला?

मामला बलांगीर जिले के रहने वाले चंडी प्रसाद खमारी का है। उन्होंने 23 अगस्त 2024 को झारसुगुड़ा से हावड़ा जाने वाली ट्रेन का टिकट बुक किया था। शेड्यूल के अनुसार, ट्रेन को सुबह 3:55 बजे हावड़ा पहुंचना था। खमारी ने पर्याप्त समय (4 घंटे का गैप) रखते हुए हावड़ा से सुबह 8:05 बजे की गुवाहाटी की फ्लाइट बुक की थी।

हालांकि, ट्रेन झारसुगुड़ा से ही देरी से चली और हावड़ा पहुंचते-पहुंचते करीब 7 घंटे लेट हो गई। इस देरी के कारण उनकी फ्लाइट छूट गई और उन्हें न केवल आर्थिक नुकसान हुआ, बल्कि भारी मानसिक परेशानी का सामना भी करना पड़ा। जब रेलवे ने उनकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया, तो उन्होंने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया।

रेलवे की दलील: 'समय पर चलने की कोई गारंटी नहीं'

सुनवाई के दौरान रेलवे ने तर्क दिया कि ट्रेन के समय पर चलने की कोई कानूनी गारंटी नहीं दी जाती है और परिचालन संबंधी कई वजहों से देरी हो सकती है। रेलवे ने यह भी कहा कि यात्री के सफर का पूरा दारोमदार केवल उन पर नहीं है, इसलिए वे पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते।

कोर्ट ने झाड़ा पल्ला: "जिम्मेदारी लेनी होगी"

उपभोक्ता अदालत ने रेलवे की 'नो गारंटी' वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

रेलवे एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई है और उसे अपनी सेवाओं की जिम्मेदारी लेनी होगी।

यदि ट्रेन लेट होती है, तो रेलवे को यह साबित करना होगा कि देरी किसी ऐसी असाधारण वजह से हुई जो उनके नियंत्रण से बाहर थी।

इस मामले में रेलवे कोई भी ठोस या विशेष कारण बताने में विफल रहा कि आखिर ट्रेन 7 घंटे क्यों लेट हुई।

हर्जाना 55 हजार से बढ़कर हुआ 1.3 लाख

शुरुआत में उपभोक्ता अदालत ने रेलवे को निम्नलिखित हर्जाने का आदेश दिया था:

फ्लाइट के नुकसान के लिए: 20,000 रुपये

मानसिक परेशानी के लिए: 30,000 रुपये

कानूनी खर्च (केस कोस्ट): 5,000 रुपये

कोर्ट ने यह भी शर्त रखी थी कि यदि 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो 500 रुपये प्रतिदिन का अतिरिक्त जुर्माना लगेगा। रेलवे ने भुगतान में देरी की, जिसके कारण जुर्माने की राशि बढ़ती गई और कुल रकम करीब 1.3 लाख रुपये पहुंच गई। अंततः 19 अप्रैल 2026 को यात्री को पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया।

यह फैसला उन लाखों रेल यात्रियों के लिए एक नजीर है जो ट्रेनों की भारी देरी के कारण अपनी कनेक्टिंग फ्लाइट या बसें मिस कर देते हैं और आर्थिक नुकसान झेलते हैं।