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November 06 2026 02:48 am

चांद की बर्फ और क्रेटर्स को सेकंडों में मैप करेगा IBM और NASA का नया AI मॉडल

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चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (Lunar South Pole) पर पानी और बर्फ की खोज की वैश्विक होड़ के बीच अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और तकनीकी दिग्गज आईबीएम (IBM) ने मिलकर एक क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। दोनों संस्थानों ने चंद्रमा की सतह, वहां मौजूद गहरे क्रेटर्स (गड्ढों), पत्थरों की बनावट और छायादार क्षेत्रों में छिपी पानी की बर्फ (Water Ice) की सटीक पहचान करने के लिए एक अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फाउंडेशन मॉडल तैयार किया है।

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए सबसे आकर्षक और रहस्यमयी क्षेत्र है, क्योंकि यहां के कई गड्ढों में अरबों वर्षों से सूर्य की किरणें नहीं पहुंची हैं। इन 'परमानेंटली शैडोड रीजन्स' (PSRs) में बर्फ के रूप में भारी मात्रा में पानी दबे होने की प्रबल संभावना है। नासा के आगामी आर्टेमिस मिशन (Artemis Program) के तहत इंसानों को सुरक्षित रूप से चांद पर उतारने और वहां स्थायी लूनर बेस (Lunar Base) स्थापित करने के लिए यह एआई मॉडल सबसे अहम तकनीकी रीढ़ साबित होने वाला है।

यह नया एआई मॉडल कैसे करता है काम?

अब तक चंद्रमा की सतह के विश्लेषण के लिए वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को विभिन्न उपग्रहों से भेजे गए लाखों अलग-अलग हाई-रेजोल्यूशन डेटासेट और तस्वीरों को मैन्युअली (हाथ से) जांचना पड़ता था। इस पारंपरिक प्रक्रिया में महीनों और वर्षों का समय लगता था। नासा और आईबीएम के नए एआई सिस्टम ने इस पूरी प्रक्रिया को स्वचालित और बेहद तेज कर दिया है:

विशाल डेटा का प्रशिक्षण: इस एआई मॉडल को नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) और अन्य लूनर मिशनों से मिले दशकों के ऑप्टिकल, इंफ्रारेड, लेजर अल्टीमीटर और थर्मल डेटा पर विशेष रूप से ट्रेन किया गया है।

गहरे अंधेरे में 'देखने' की क्षमता: चंद्रमा के जिन गड्ढों में कभी धूप नहीं पहुंचती, वहां सामान्य कैमरे काम नहीं करते। यह एआई मॉडल थर्मल इमेजरी (तापमान डेटा) और सेकेंडरी लाइट रिफ्लेक्शन का विश्लेषण कर यह भांप लेता है कि गड्ढे के किस हिस्से में तापमान शून्य से इतना नीचे है जहां बर्फ सुरक्षित रह सकती है।

सटीक 3D जियोस्पेशियल मैपिंग: एआई कुछ ही सेकंडों में किसी खास इलाके का उच्च-सटीकता वाला 3D एलिवेशन मॉडल तैयार कर देता है। यह सिस्टम यह भी पहचान लेता है कि सतह पर पड़े बोल्डर (विशाल पत्थर) का आकार क्या है और लैंडर के उतरने के लिए सतह कितनी ढलान वाली या सुरक्षित है।

आर्टेमिस मिशन और भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए क्यों है वरदान?

नासा का लक्ष्य केवल चांद का चक्कर लगाना नहीं, बल्कि वहां इंसानों को लंबे समय तक टिकाए रखना और भविष्य के मंगल मिशन (Mars Missions) के लिए एक लॉन्चपैड तैयार करना है। इस दिशा में यह एआई मॉडल निम्नलिखित तरीकों से ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा:

पीने का पानी और ऑक्सीजन: यदि यह एआई चांद की बर्फ के सटीक ठिकानों को चिह्नित करता है, तो अंतरिक्ष यात्रियों को धरती से पानी ढोने की आवश्यकता नहीं होगी। इस बर्फ को पिघलाकर पीने के पानी और इलेक्ट्रोलाइजर के जरिए सांस लेने योग्य ऑक्सीजन बनाई जा सकेगी।

रॉकेट ईंधन का उत्पादन: पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर रॉकेटों के लिए लिक्विड हाइड्रोजन ईंधन (Liquid Fuel) तैयार किया जा सकता है। इससे चांद पर ही 'स्पेस फ्यूलिंग स्टेशन' बनाना मुमकिन हो सकेगा।

सुरक्षित लैंडिंग साइट्स का चयन: चंद्रयान-3 समेत दुनिया के अन्य अभियानों ने साबित किया है कि दक्षिणी ध्रुव पर उतरना बेहद जोखिम भरा है। यह एआई सिस्टम लैंडर और रोवर के लिए ऐसे रास्तों और स्थलों का चुनाव करेगा जहां खाई, तीखे गड्ढे या खतरनाक पत्थर न हों।

ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म: दुनिया भर के वैज्ञानिकों को मुफ्त मिलेगा एक्सेस

इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि नासा और आईबीएम ने इस एआई फाउंडेशन मॉडल को किसी गुप्त तकनीक की तरह बंद रखने के बजाय इसे ओपन-सोर्स (Hugging Face प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध) रखने का फैसला किया है।

इसका अर्थ यह है कि दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां (जैसे भारत का इसरो, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी), वैज्ञानिक, शोधकर्ता और यहां तक कि स्वतंत्र अंतरिक्ष स्टार्टअप्स भी इस मॉडल को अपनी जरूरतों के अनुसार कस्टमाइज कर सकते हैं। वे चांद के अलावा मंगल ग्रह और क्षुद्रग्रहों (Asteroids) की मैपिंग के लिए भी इस एआई टूलकिट का उपयोग कर सकेंगे।

अंतरिक्ष अन्वेषण में डेटा की चुनौती को मात देगा एआई

नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष अभियानों से आने वाले डेटा की मात्रा अब इतनी विशाल हो चुकी है कि मानव विश्लेषक उसका केवल 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा ही समय रहते खंगाल पाते थे। आईबीएम के साथ मिलकर तैयार किए गए इस एआई ने अंतरिक्ष डेटा के समंदर को ज्ञान और समाधान में बदल दिया है। यह नवाचार न केवल चांद पर इंसानी बस्तियों की नींव रखने में मदद करेगा, बल्कि सौर मंडल के गहरे रहस्यों को सुलझाने की इंसानी रफ्तार को कई गुना बढ़ा देगा।