दशमी के संयम से लेकर तुलसी के विधान तक, जानिए व्रत के 6 महाकड़े नियम और पारण का सटीक मुहूर्त
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की पावन तिथि यानी अजा एकादशी को शास्त्रों में समस्त पापों का हरण करने वाली और मोक्ष प्रदायिनी तिथि माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग के सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने खोए हुए राज्य, मान-सम्मान और परिवार को वापस पाने के लिए महर्षि गौतम के मार्गदर्शन में अजा एकादशी का ही कठोर व्रत किया था। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को केवल एक दिन का उपवास नहीं माना जाता, बल्कि यह तीन दिनों—दशमी, एकादशी और द्वादशी तक चलने वाली आत्म-संयम, देह-शुद्धि और भक्ति की अखंड साधना है। शास्त्रों में वर्णित विधान के अनुसार, यदि व्रती इन पावन तिथियों में नियमों की जरा सी भी अनदेखी करता है, तो व्रत का वास्तविक फल खंडित हो जाता है। विशेष रूप से दशमी तिथि का खान-पान संयम और एकादशी पर तुलसी से जुड़े कड़े दिशा-निर्देश इस व्रत की प्राण-शक्ति हैं।
1. दशमी तिथि का कड़ा संयम और सात्विक आहार का नियम
एकादशी व्रत की तैयारी वास्तव में एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि के सूर्यास्त से ही प्रारंभ हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार, दशमी तिथि की शाम को सूर्यास्त के बाद किसी भी प्रकार का अन्न ग्रहण करना पूर्णतः वर्जित है। दशमी के दिन भोजन पूरी तरह से सात्विक होना चाहिए; इसमें प्याज, लहसुन, मसूर की दाल, बैंगन, चना और बासी भोजन का उपयोग सर्वथा निषिद्ध माना गया है। व्रती को दशमी की रात्रि में भूमि शयन या सात्विक बिस्तर पर सोना चाहिए और मन में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भगवान विष्णु के ध्यान में लीन रहना चाहिए। इस रात्रि संयम से शरीर और पाचन तंत्र एकादशी के कठोर उपवास के लिए पूरी तरह शुद्ध और तैयार हो जाता है।
2. एकादशी के दिन तुलसी दल तोड़ने और जल अर्पित करने की सख्त मनाही
तुलसी को भगवान विष्णु की परम प्रिय और साक्षात वृंदा का स्वरूप माना गया है। अजा एकादशी पर तुलसी को लेकर दो सबसे बड़े और कड़े नियम शास्त्रों में बताए गए हैं। पहला नियम यह है कि एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को कभी भी जल अर्पित नहीं किया जाता, क्योंकि पौराणिक मान्यता के अनुसार मां तुलसी स्वयं इस दिन भगवान श्रीहरि के निमित्त निर्जला उपवास रखती हैं। दूसरा सबसे बड़ा नियम यह है कि एकादशी तिथि के दिन तुलसी का पत्ता तोड़ना महापाप की श्रेणी में आता है। भगवान को भोग लगाने के लिए तुलसी दल हमेशा दशमी तिथि को सूर्यास्त से पहले ही तोड़कर रख लेना चाहिए, अथवा पूजा के समय पौधे के नीचे स्वतः गिरे हुए पत्तों को गंगाजल से धोकर प्रयोग में लाना चाहिए। बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु किसी भी नैवेद्य को स्वीकार नहीं करते।
3. चावल का पूर्ण त्याग और शुद्ध फलाहार का विधान
एकादशी के दिन चावल (अक्षत) का सेवन करना शास्त्रों में अत्यंत वर्जित बताया गया है। महर्षि मेधा से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, एकादशी के दिन जो व्यक्ति चावल खाता है, वह महर्षि के रक्त और मांस का भक्षण करने के समान पाप का भागीदार बनता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एकादशी पर चावल खाने से शरीर में जल तत्व की मात्रा बढ़ती है, जिससे मन चंचल और सुस्त होता है तथा ध्यान साधना में बाधा पहुंचती है। जो लोग निर्जला या सजल उपवास नहीं रख सकते, वे एक समय सात्विक फलाहार जैसे कुट्टू का आटा, सिंघाड़ा, फल, दूध या मखाने का सेवन कर सकते हैं। भोजन में साधारण नमक के स्थान पर केवल सेंधा नमक का ही उपयोग करना चाहिए।
4. रात्रि जागरण, विष्णु सहस्रनाम और अखंड मंत्र जप
एकादशी की रात्रि को सामान्य दिनों की भांति गहरी नींद में सोकर व्यतीत नहीं करना चाहिए। इस तिथि की रात को 'महाजागृति काल' माना जाता है। व्रती को चाहिए कि वह रात में भगवान नारायण और माता लक्ष्मी के सम्मुख घी का अखंड दीपक जलाकर भजन-कीर्तन, श्री विष्णु सहस्रनाम, कनकधारा स्तोत्र या श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करे। तुलसी की माला से "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" महामंत्र की कम से कम 11 माला का जप अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि एकादशी की रात जो जातक जागरण करके प्रभु का स्मरण करता है, उसके कई जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सीधे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
5. वाणी पर पूर्ण नियंत्रण, ब्रह्मचर्य और क्रोध का त्याग
उपवास का वास्तविक अर्थ केवल पेट को भूखा रखना नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय पाना है। एकादशी के दिन किसी की चुगली करना, झूठ बोलना, अपशब्दों का प्रयोग करना या किसी के प्रति मन में द्वेष भाव लाना व्रत को निष्फल कर देता है। इस दिन क्रोध पर पूर्ण अंकुश रखना चाहिए और घर के बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं तथा असहायों का अनादर नहीं करना चाहिए। दिनभर में बार-बार बाल संवारना, दाढ़ी-मूंछ बनवाना, नाखून काटना या तेल मालिश करना भी शास्त्रों में निषेध माना गया है। मन, वचन और कर्म—तीनों स्तरों पर शुद्धता और शांत भाव बनाए रखना ही इस व्रत की वास्तविक मर्यादा है।
6. अजा एकादशी व्रत पारण का सही समय और नियम
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर ही किया जाता है। हरि वासर (द्वादशी तिथि का प्रथम चतुर्थांश) के दौरान कभी भी व्रत नहीं खोलना चाहिए।
पारण तिथि: 8 सितंबर 2026, मंगलवार
पारण का शुभ समय: सुबह 06:02 बजे से सुबह 08:33 बजे तक
द्वादशी तिथि की समाप्ति: दोपहर 02:42 बजे
पारण के दिन सुबह स्नानादि के बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें। इसके बाद अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी ब्राह्मण या निर्धन जरूरतमंद व्यक्ति को कच्चा अन्न (सीधा), पीले वस्त्र, मौसमी फल और दक्षिणा का दान करें। गौमाता को हरा चारा और गुड़ खिलाएं। इसके उपरांत भगवान के चरणामृत, तुलसी दल और सात्विक अन्न ग्रहण करके अपने व्रत का विधिवत पारण करें।