1 अप्रैल से इतिहास बन जाएगा 'Form-16', अब इस नए नाम से होगी आपकी पहचान, जानें क्या बदला
India News Live,Digital Desk : नौकरीपेशा लोगों के लिए एक बड़ी खबर सामने आ रही है। आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाने वाला 'फॉर्म-16' (Form-16) अब बीते दिनों की बात होने जा रहा है। केंद्र सरकार 1 अप्रैल 2026 से नए आयकर अधिनियम, 2025 को लागू करने जा रही है, जिसके तहत टैक्स से जुड़े कई दस्तावेजों के नाम और स्वरूप बदल दिए जाएंगे। अगर आप सैलरीड क्लास हैं या पेंशनभोगी, तो आपके लिए यह समझना जरूरी है कि अब आपको अपनी आय के प्रमाण के लिए किस फॉर्म की जरूरत पड़ेगी।
फॉर्म-16 की जगह लेगा 'फॉर्म 130': क्या है नया नियम?
अब तक नियोक्ता (Employer) द्वारा कर्मचारी को दिया जाने वाला टीडीएस सर्टिफिकेट 'फॉर्म-16' कहलाता था। इसमें आपके वेतन, काटे गए टैक्स और निवेश की पूरी जानकारी होती थी। लेकिन नए आयकर कानून 2025 के तहत, अब इसका नाम बदलकर 'फॉर्म 130' कर दिया गया है। 1 अप्रैल से आपको अपने दफ्तर से फॉर्म-16 की जगह यही नया फॉर्म मिलेगा। हालांकि, इसके जमा करने की अंतिम तिथि में कोई बदलाव नहीं हुआ है; वित्त वर्ष खत्म होने के बाद 15 जून तक नियोक्ता को यह फॉर्म जारी करना अनिवार्य होगा।
किराया और ब्याज पर TDS: फॉर्म 16A भी अब नए अवतार में
बदलाव केवल सैलरी वालों के लिए ही नहीं है। अगर आपकी आय का जरिया किराया, बैंक ब्याज या कंसल्टेंसी फीस है, तो आपको मिलने वाला फॉर्म 16A भी अब इतिहास बन जाएगा। इसकी जगह अब 'फॉर्म 131' पेश किया गया है। यह फॉर्म भी टीडीएस प्रमाणपत्र के रूप में ही काम करेगा, जिसे संबंधित तिमाही (Quarter) का टीडीएस विवरण जारी होने के 15 दिनों के भीतर घोषित करना होगा।
26AS और अन्य दस्तावेजों के भी बदले नाम
आयकर विभाग ने टैक्स सिस्टम को सरल बनाने के लिए पूरी डिक्शनरी ही बदल दी है। नए कानून के तहत प्रमुख दस्तावेजों के नाम इस प्रकार होंगे:
फॉर्म 26AS (एनुअल टैक्स स्टेटमेंट) अब 'दस्तावेज 168' कहलाएगा।
फॉर्म 24Q (त्रैमासिक टीडीएस स्टेटमेंट) का नया नाम 'दस्तावेज 138' होगा।
इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य 1961 के पुराने कानून की जगह आधुनिक 'आयकर अधिनियम 2025' को पूरी तरह से स्थापित करना है।
क्या आपकी जेब या टैक्स पर पड़ेगा असर?
टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि इन बदलावों से घबराने की जरूरत नहीं है। दस्तावेजों के सिर्फ नाम बदले जा रहे हैं, उनकी कार्यप्रणाली (Functionality) में कोई बदलाव नहीं किया गया है। टैक्स स्लैब या टैक्स की दरों पर भी इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। सरकार का दावा है कि इस कदम से नियमों का दोहराव खत्म होगा और करदाताओं पर कागजी कार्रवाई का बोझ कम होगा। यह 1961 से चले आ रहे पुराने कानून को आधुनिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने की एक कोशिश है।