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July 14 2026 05:49 am

सोशल मीडिया पर 'डिजिटल लॉकडाउन': क्या अब बच्चे नहीं चला पाएंगे Instagram और YouTube? 20 से ज्यादा देशों में बैन की तैयारी

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नई दिल्ली: क्या दुनियाभर के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का दौर खत्म होने वाला है? यह सवाल अब पूरी दुनिया में तेजी से गूंज रहा है। बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत को बचाने के लिए पिछले साल दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया द्वारा शुरू किया गया 'पॉलिसी एक्सपेरिमेंट' अब एक ग्लोबल ट्रेंड बन चुका है। ऑस्ट्रेलिया और यूएई (UAE) के नक्शेकदम पर चलते हुए अब भारत सहित दुनिया के 20 से अधिक देश 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह ताला लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऑस्ट्रेलिया के इस कड़े कदम की सराहना की थी, जिसके बाद भारत में भी ऐसे कानून को लेकर कयास बढ़ गए हैं।

5 देशों में पहले से ही लग चुका है ताला

वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया के 5 प्रमुख देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पहले ही कड़ा प्रतिबंध लागू कर दिया है:

चीन: साल 2023 से ही नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया और स्क्रीन टाइमिंग को लेकर सख्त नियम लागू हैं।

ऑस्ट्रेलिया: पिछले साल दिसंबर (2025) से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कानूनी रूप से पूर्ण प्रतिबंध है।

इंडोनेशिया: इस साल मार्च 2026 में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया।

मलेशिया: बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऐसा ही सख्त कानून लागू कर चुका है।

यूएई और तुर्की: तुर्की इस साल (2026) के आखिर तक और यूएई अगले साल से इन प्लेटफॉर्म्स को बच्चों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित कर देगा।

इन देशों ने भी कर दिया है बड़ा ऐलान

आने वाले सालों में कई और विकसित देश इस फेहरिस्त में शामिल होने जा रहे हैं। ब्रिटेन (यूके) और ग्रीस ने साल 2027 से, जबकि स्वीडन ने 2028 से बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने का टाइमलाइन तय कर दिया है। इसके अलावा कनाडा और नॉर्वे इसी साल (2026) संसद में कानून ला सकते हैं। जर्मनी, डेनमार्क, फ्रांस, इटली, स्पेन और आयरलैंड जैसे यूरोपीय देश भी संकेत दे चुके हैं कि वे जल्द ही बच्चों की डिजिटल दुनिया पर ताला लगाने वाले हैं।

क्यों सोशल मीडिया को बच्चों के लिए विलेन माना जा रहा है?

सरकारों और बाल रोग विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कभी भी बच्चों के मनोविज्ञान के हिसाब से डिजाइन ही नहीं किया गया था।

मानसिक और शारीरिक सेहत पर वार: लगातार रील और शॉर्ट वीडियो देखने की लत से बच्चों में डिप्रेशन, गंभीर एंग्जायटी (चिंता), अकेलापन और शारीरिक सक्रियता कम होने से मोटापा जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

क्या कहते हैं आलोचक?: हालांकि, इस कानून के आलोचकों का तर्क है कि बच्चों पर पूरी तरह बैन लगाना व्यावहारिक नहीं है। तकनीकी रूप से समझदार बच्चे वीपीएन (VPN) या फर्जी उम्र बताकर इन प्रतिबंधों को आसानी से दरकिनार कर लेंगे। इसलिए बैन के बजाय डिजिटल साक्षरता और पैरेंटल कंट्रोल पर ध्यान दिया जाना चाहिए।