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September 30 2026 09:07 pm

308 पहियों पर लोड 200 टन का 'बाहुबली' बॉयलर पहुंचा वाराणसी, दलदल में फंसने के बाद ऐसे निकला महामशीन

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सड़क मार्ग पर चलने वाली किसी भी महामशीन के संचालन में किस स्तर की इंजीनियरिंग, धैर्य और तकनीकी सूझबूझ की आवश्यकता होती है, इसका जीता-जागता प्रमाण उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में देखने को मिला। गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह से करीब 1,700 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करके निकला 200 टन वजनी विशालकाय इंडस्ट्रियल बॉयलर आखिरकार तमाम बाधाओं को पार करते हुए अपने अंतिम पड़ाव वाराणसी पहुंच गया है। 308 पहियों वाले भारी-भरकम हाइड्रोलिक एक्सल ट्रेलर पर लदा यह 'बाहुबली' बॉयलर जब वाराणसी की सीमा में दाखिल हुआ, तो हाईवे से गुजरने वाला हर राहगीर इस अद्भुत नजारे को देखकर दंग रह गया। इस सफर की सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आई थी, जब रास्ते में सड़क धंसने से यह महामशीन दलदल में फंस गई थी और इसे निकालने के लिए इंजीनियरों को हफ्तों तक कड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना पड़ा था।

यह विशालकाय बॉयलर वाराणसी क्षेत्र में स्थापित हो रहे एक बड़े औद्योगिक और ऊर्जा संयंत्र का हिस्सा है। अत्यधिक भारी वजन और अतिविशाल आकार के कारण इसे मालगाड़ी या सामान्य परिवहन के माध्यम से ले जाना असंभव था। यही कारण था कि मल्टी-एक्सल हाइड्रोलिक पुलर्स और विशेष टेलर का उपयोग करते हुए इस महामिशन को सड़क मार्ग से पूरा करने का जोखिम भरा फैसला लिया गया।

जब दलदल में धंस गए थे ट्रेलर के पहिए, 25 दिन चला था रेस्क्यू ऑपरेशन

इस 11 महीने लंबे सफर का सबसे नाजुक और तनावपूर्ण मोड़ उस वक्त आया था, जब यात्रा के दौरान बारिश और सड़क के किनारे कमजोर मिट्टी होने की वजह से 308 पहियों वाले ट्रेलर के कई पिछले एक्सल गहरे दलदल में धंस गए थे। 200 टन के बॉयलर और करीब 150 टन के ट्रेलर का कुल 350 टन से अधिक का भार पड़ते ही सड़क का किनारा बैठ गया था। महामशीन के फंसते ही राष्ट्रीय राजमार्ग पर आवागमन प्रभावित होने का खतरा मंडराने लगा और इंजीनियरों के हाथ-पांव फूल गए, क्योंकि जरा सी भी तकनीकी चूक से ट्रेलर पलट सकता था।

ट्रेलर को दलदल से निकालने के लिए भारी-भरकम क्रेन, हाइड्रोलिक जैक, विशेष लोहे की मोटी स्टील प्लेट्स और दो अतिरिक्त हेवी-ड्यूटी वॉल्वो पुलर्स को मौके पर बुलाया गया। इंजीनियरों की तकनीकी टीम ने दिन-रात एक करके पहियों के नीचे स्टील की गर्डर और प्लेटें बिछाईं। लगभग 25 दिनों तक चले बेहद जटिल और सतर्क बचाव अभियान के बाद बॉयलर को बिना किसी खरोंच के सुरक्षित बाहर निकाला गया। इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन का वीडियो सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हुआ था, जिसे देख लोगों ने भारतीय इंजीनियरों के हुनर की जमकर तारीफ की थी।

308 पहिये, 4 पुलर्स और महज 5 से 10 किमी प्रति घंटे की रफ्तार

इस महामशीन के परिवहन का तकनीकी ढांचा किसी अजूबे से कम नहीं है। 200 टन के बॉयलर का वजन समान रूप से वितरित करने के लिए 308 पहियों वाले विशेष मॉड्यूलर हाइड्रोलिक ट्रेलर का इस्तेमाल किया गया। इस ट्रेलर की खासियत यह होती है कि इसका हर पहिया और एक्सल कंप्यूटर तथा हाइड्रोलिक प्रेशर द्वारा स्वतंत्र रूप से नियंत्रित होता है, जिससे मोड़ पर मुड़ते समय संतुलन नहीं बिगड़ता।

इस विशालकाय काफिले को खींचने और पीछे से धक्का देने के लिए 500 से अधिक हॉर्सपावर वाले 4 शक्तिशाली हैवी-ड्यूटी पुलर्स (ट्रक) तैनात किए गए थे। सुरक्षा के लिहाज से इस काफिले की गति औसतन 5 से 10 किलोमीटर प्रति घंटा ही रखी गई थी। जहां सामान्य गाड़ियों को गुजरात से वाराणसी आने में दो से तीन दिन का समय लगता है, वहीं इस बॉयलर को अपनी मंजिल तक पहुंचने में लगभग 11 महीने का लंबा वक्त लग गया। रास्ते में पड़ने वाले हर छोटे-बड़े मोड़ और चौराहे को पार करने में घंटों की माथापच्ची करनी पड़ती थी।

रास्ते में बिजली के तार हटाए गए, पुलों की मजबूती की हुई तकनीकी जांच

इस भारी-भरकम मशीन को वाराणसी तक लाना केवल गाड़ी चलाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके लिए कई राज्यों के प्रशासनिक और तकनीकी विभागों के बीच जबर्दस्त तालमेल बैठाना पड़ा। बॉयलर की अत्यधिक ऊंचाई के कारण रास्ते में पड़ने वाले हाईटेंशन बिजली के तारों को अस्थायी रूप से ऊंचा करना पड़ा या शटडाउन लेकर तार काटने पड़े। इसके लिए बिजली विभाग की टीमें लगातार काफिले के आगे-आगे पेट्रोलिंग कर रही थीं।

सफर के दौरान पड़ने वाले नदी और नालों के पुलों को पार करना सबसे जोखिम भरा कार्य था। 350 टन से अधिक का संयुक्त वजन किसी भी पुराने पुल को नुकसान पहुंचा सकता था। इसके लिए नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) और लोक निर्माण विभाग (PWD) के इंजीनियरों ने रूट पर पड़ने वाले दर्जनों पुलों की भार वहन क्षमता (लोड बेयरिंग कैपेसिटी) की पहले से जांच की। कई स्थानों पर पुलों के नीचे अतिरिक्त लोहे के सपोर्टिंग पिलर खड़े किए गए, जबकि कुछ जगहों पर नदी के किनारे कच्चा डायवर्जन बनाकर ट्रेलर को निकाला गया।

अब वाराणसी स्थित प्लांट साइट पर बॉयलर के सकुशल पहुंच जाने के बाद परियोजना से जुड़े इंजीनियरों, लॉजिस्टिक्स टीम और स्थानीय प्रशासन ने राहत की सांस ली है। भारी औद्योगिक उपकरणों के सुरक्षित परिवहन के क्षेत्र में इस ऑपरेशन को लॉजिस्टिक्स इंजीनियरिंग का एक बड़ा कीर्तिमान माना जा रहा है।