नावी पिल्लई को शांति का नोबेल मिलते ही भड़के ट्रंप! न्यायविद से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पर ही जड़ दिए कड़े प्रतिबंध
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आजीवन संघर्ष करने वाली भारतीय मूल की विख्यात न्यायविद और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार उच्चायुक्त नवनेथम 'नावी' पिल्लई को शांति का नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अप्रत्याशित भूचाल आ गया है। नोबेल मंच से नावी पिल्लई द्वारा पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर कसे गए चुटीले तंज और युद्ध अपराधों के खिलाफ उनकी वर्षों पुरानी जांचों ने वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। ट्रंप और उनके कड़े समर्थक खेमे ने इस पर बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं और पिल्लई से जुड़े जांच आयोगों पर सीधे आर्थिक और वीजा प्रतिबंध लगाने की मांग और घोषणाओं का सिलसिला शुरू कर दिया है। इस अप्रत्याशित कदम ने वैश्विक मानवाधिकार मंचों, संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
अदालतों और जांच आयोगों पर प्रतिबंध: ट्रंप की पुरानी नाराजगी और ताजा एक्शन
अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) व संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के बीच टकराव का इतिहास काफी पुराना रहा है। डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से यह रुख अपनाते रहे हैं कि हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालतें और संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग अमेरिका और उसके करीबी सहयोगियों (विशेषकर इजरायल) के खिलाफ राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर काम करते हैं। नावी पिल्लई लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की जज रहीं और हाल के वर्षों में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र द्वारा गाजा और अधिकृत क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए गठित उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच आयोग (COI) की अध्यक्षता की थी। इस आयोग द्वारा जारी की गई निष्पक्ष रिपोर्टों से अमेरिकी विदेश नीति और उसके रणनीतिक साझीदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे थे। नोबेल सम्मान मिलने के तुरंत बाद ट्रंप ने इसे 'वैश्विक संस्थाओं का पक्षपात' करार देते हुए उन सभी न्यायिक निकायों, जजों और जांचकर्ताओं पर अमेरिका में संपत्ति फ्रीज करने तथा यात्रा प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया जो अमेरिकी हितों के खिलाफ जांच का नेतृत्व करते रहे हैं।
नावी पिल्लई का निर्भीक इतिहास: महाशक्तियों के दबाव के आगे न झुकने का संकल्प
80 वर्ष से अधिक उम्र की नावी पिल्लई अपने छह दशक के लंबे करियर में कभी भी किसी महाशक्ति के दबाव में नहीं झुकी हैं। डरबन की एक साधारण बस्ती में तमिल बस ड्राइवर के घर जन्मीं पिल्लई ने श्वेत वर्चस्व वाली अदालतों में नेल्सन मंडेला और रंगभेद विरोधी सेनानियों की वकालत करके अपने सफर की शुरुआत की थी। बाद में रवांडा अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में उन्होंने युद्ध के दौरान सामूहिक दुष्कर्म को नरसंहार (Genocide) का हथियार घोषित करके इतिहास रचा। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के पद पर रहते हुए भी उन्होंने इराक, अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियानों, सीआईए की गुप्त जेलों और ड्रोन हमलों में मारे गए निर्दोष नागरिकों के मुद्दे पर वाशिंगटन की नीतियों की खुलकर निंदा की थी। यही बेबाकी उनकी पहचान रही है और यही वजह है कि अमेरिकी दक्षिणपंथी खेमा उन्हें लंबे समय से अपनी आलोचना का केंद्र बनाता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था पर गहराता संकट: वैश्विक प्रतिक्रियाएं
ट्रंप द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यायिक तंत्र को सीधे निशाने पर लेने और प्रतिबंध थोपने के फैसले पर दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों और कानूनी संस्थाओं ने गहरी चिंता जताई है। यूरोपियन यूनियन के कई देशों, कानूनी जानकारों और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि न्याय की रक्षा करने वाले जजों और मानवाधिकार अधिवक्ताओं को दंडित करना अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन (Rule of Law) को नष्ट करने जैसा खतरनाक कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ताकतवर देश अपनी सुविधानुसार अंतरराष्ट्रीय अदालतों पर पाबंदियां लगाने लगेंगे, तो युद्ध अपराधों, नरसंहार और मानवाधिकार हनन के शिकार निर्दोष लोगों के लिए इंसाफ पाने के सभी रास्ते बंद हो जाएंगे। आलोचकों का कहना है कि यह कार्रवाई किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि समूची अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली को पंगु बनाने का प्रयास है।
कूटनीतिक संदेश: सत्ता की धमकियों के सामने अडिग खड़ा न्याय का प्रतीक
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सत्ता और सिद्धांतों के बीच का संघर्ष कभी खत्म नहीं होता। नावी पिल्लई को मिला नोबेल पुरस्कार जहां दुनिया के दबे-कुचले, शोषित और हाशिए पर खड़े लोगों के अधिकारों की वैश्विक विजय का प्रतीक है, वहीं उन पर और उनकी न्यायिक विरासत पर प्रतिबंधों की कार्रवाई वैश्विक राजनीति में बढ़ते लोकलुभावनवाद और संस्थागत असहिष्णुता को दर्शाती है। हालांकि, नावी पिल्लई के समर्थकों और विधि विशेषज्ञों का कहना है कि जिस न्यायविद ने रंगभेद की अमानवीय जेलों और रवांडा के खून-खराबे के मुकदमों में सच का साथ नहीं छोड़ा, वह किसी भी देश के राजनीतिक प्रतिबंधों या धमकियों से झुकने वाली नहीं हैं।