रूस से व्यापार या अमेरिकी बाज़ार? अमेरिकी सीनेटर ने भारत-चीन को दिया कड़ा संदेश, ट्रम्प के टैरिफ का दिया हवाला

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India News Live,Digital Desk : वैश्विक मंच पर जारी रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके परिणामों के बीच, अमेरिकी राजनीति से एक तीखा और महत्वपूर्ण बयान आया है। एक प्रभावशाली अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भारत और चीन को सीधा और कड़ा संदेश दिया है। उनका कहना है कि अगर ये दोनों देश रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदना जारी रखते हैं, तो उन्हें इसके "भयानक परिणाम" भुगतने पड़ सकते हैं, यहाँ तक कि उनकी अर्थव्यवस्थाएं "कुचली" भी जा सकती हैं।

क्या है पूरा मामला और अमेरिकी सीनेटर की चेतावनी?
यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों, विशेषकर यूरोपीय संघ ने रूस से तेल और गैस खरीदने पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। इसका सीधा फायदा भारत और चीन को मिला है, जो रूस से भारी मात्रा में रियायती दर पर तेल खरीद रहे हैं। इसे देखते हुए, सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने खुलकर कहा है: "यदि भारत और चीन रूस से भारी मात्रा में तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं, तो हमारा संदेश यह है कि यदि आप यूक्रेन के संबंध में पुतिन के साथ खड़े हैं तो आपको कीमत चुकानी पड़ेगी। हम सिर्फ खड़े नहीं होंगे और आपको मुनाफा नहीं कमाने देंगे।"

'Trump जैसे लगाएंगे 30% टैरिफ'
सीनेटर ग्राहम ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका इस स्थिति पर आंखें नहीं मूंदेगा। उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प के समय में चीन पर लगाए गए 30 प्रतिशत टैरिफ का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका ऐसे "अनुचित व्यापार व्यवहार" का जवाब देगा। उनका तर्क है कि अगर ऐसे कदम नहीं उठाए जाते हैं, तो इससे रूस को एक स्पष्ट संदेश जाएगा कि पश्चिमी देश यूक्रेन के लिए उनके साथ नहीं खड़े हैं, बल्कि कुछ देश अपनी व्यापारिक ज़रूरतों के लिए रूसी आक्रमण का फायदा उठा रहे हैं।

भारत और चीन के सामने मुश्किल पसंद
लिंडसे ग्राहम ने अमेरिका की आर्थिक शक्ति पर जोर देते हुए कहा, "हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। उन्हें यह जानना होगा कि अगर आप रूस से व्यापार करते हैं तो आपको अमेरिका में अपने माल के लिए टैरिफ या आर्थिक प्रभाव का सामना करना पड़ेगा। यह एक बहुत ही सरल विकल्प है: या तो रूसी तेल खरीदें या अमेरिकी सामान। आप दोनों काम नहीं कर सकते।"

उनका यह बयान दिखाता है कि अमेरिकी प्रशासन भारत और चीन द्वारा रूस के साथ जारी व्यापार को कितनी गंभीरता से ले रहा है। यह सीधे तौर पर नई दिल्ली और बीजिंग पर एक आर्थिक दबाव बनाने का प्रयास है, ताकि वे अपने ऊर्जा खरीद के स्रोतों पर पुनर्विचार करें और रूसी अर्थव्यवस्था को सहारा देना बंद करें। अब देखना होगा कि भारत और चीन इस चेतावनी का क्या जवाब देते हैं और क्या उनकी विदेश नीति पर इसका कोई प्रभाव पड़ता है।