BREAKING:
May 12 2026 06:22 pm

केरल में वामपंथ का 'सूर्यास्त' अमेरिका से आया बड़ा बयान भारतीय समझदार, हम बेवकूफ जो कम्युनिस्टों को चुन रहे

Post

India News Live, Digital Desk: केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने न केवल भारत, बल्कि सात समंदर पार अमेरिका में भी वैचारिक बहस छेड़ दी है। छह दशकों तक केरल की राजनीति की धुरी रहे वामपंथ (Left) के पतन पर अमेरिकी पॉलिसी एक्सपर्ट मार्क डबोविट्ज का एक तीखा बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। डबोविट्ज ने भारतीय मतदाताओं की सूझबूझ की तारीफ करते हुए अपने ही देश (अमेरिका) के लोगों को खरी-खोटी सुनाई है।

“हां, हम इतने बेवकूफ हैं”अमेरिकी एक्सपर्ट का ट्वीट चर्चा में

अमेरिकी पॉलिसी एनालिस्ट और 'फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज' (FDD) के सीईओ मार्क डबोविट्ज ने 'एक्स' (Twitter) पर केरल के नतीजों को साझा करते हुए लिखा:"भारत कम्युनिस्टों को सत्ता से बाहर फेंक रहा है, जबकि अमेरिका उन्हें अपने शहरों, राज्यों और कांग्रेस के सदस्यों के रूप में चुन रहा है। हां, हम इतने बेवकूफ हैं।"

डबोविट्ज का इशारा अमेरिका के कुछ शहरों और राज्यों में बढ़ते वामपंथी झुकाव की ओर था, जबकि उन्होंने भारत के मतदाताओं को 'कम्युनिस्ट मुक्त' राजनीति की दिशा में बढ़ने के लिए सराहा।

केरल में UDF की 'सुनामी', महज 35 सीटों पर सिमटा LDF

केरल के चुनावी नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। 140 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 102 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया है। वहीं, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वामपंथी गठबंधन (LDF) केवल 35 सीटों पर सिमट कर रह गया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस बार राज्य में 3 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।

भारतीय राजनीति के नक्शे से 'लाल' रंग गायब

इस हार के साथ ही भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है। 1957 में दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार देने वाले केरल में अब वामपंथ का आखिरी किला ढह गया है।

बंगाल: 2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल के शासन का अंत किया।

त्रिपुरा: 2018 में भाजपा ने लेफ्ट को सत्ता से बाहर किया।

केरल: 2026 के इन नतीजों के बाद अब भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है।

क्यों हारी लेफ्ट सरकार?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि केरल का 'सक्सेस मॉडल' अब अपनी चमक खो चुका है। युवा मतदाता अब केवल सब्सिडी और पेंशन के भरोसे नहीं रहना चाहते। उन्हें निजी निवेश, स्टार्टअप कल्चर और रोजगार के बेहतर अवसर चाहिए। सरकारी नियंत्रण और 'ट्रेड यूनियन' की राजनीति के कारण राज्य में औद्योगिक विकास की गति धीमी रही, जिसका खामियाजा पिनाराई विजयन सरकार को भुगतना पड़ा।

राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर संकट

चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, किसी भी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बने रहने के लिए कुछ राज्यों में न्यूनतम वोट प्रतिशत या सीटें हासिल करनी होती हैं। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद अब केरल में भी करारी हार के बाद सीपीआई(एम) के 'राष्ट्रीय पार्टी' के दर्जे पर भी खतरा मंडराने लगा है।